बिखरे मोती  मुस्कान चाँदनी


बिखरे मोती

मुस्कान चाँदनी

धागों में पिरोकर रखे थे
हम अपने सपनों को
मोती के रूप में,
एक-एक कर सजाया हमने
सपनों के मोतियों को।
तब जाकर बन सकी थी
मेरे सपनों की माला।
वह समय आ ही गया
जिसका सदियों से इंतज़ार
कर रहे थे मेरे नैना
माला के पूरा होने का,
मन सोचकर उत्साहित था
कल होगी मेरे पास
वह सुनहरी ख्वाबों की माला।
अचानक छूट गयी माला
मेरे हाथों से,
बिखर गए मोती
एक-एक कर
जिस तरह हमने सजाए थे।
बहा था आँसू भी आँखों से
टपक पड़ा था लहू का कतरा कतरा
हुआ जज़्बातों पर भी पहरा।
पिरोना चाहा फिर से
सपनों को मोती के रूप में,
इस बार धागे ही न मिले
हमेशा धोखा देती रही है
मेरी किस्मत।
जब पूरे होने लगते हैं मेरे सपने
क्यों बिखर जाते हैं
मोती के जैसे धागों से।

अपने विचार साझा करें




0
ने पसंद किया
112
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com