स्त्री  Saurabh Awasthi

स्त्री

Saurabh Awasthi

स्त्री ही जननी होती है
है उसने यह संसार जना,
फिर क्यों ये यहाँ फैली है प्रथा ?
है उसका ही सत्कार मना।
 

कितने तुम पर बरसाए
हैं उसने तुम उपकार सुनो,
ना भूलो उसकी निश्छलता
उसकी बातें हर बार सुनो।
 

एक स्त्री ही माँ होती है
ज़रा याद करो उसकी ममता,
प्रत्येक भाव से प्रेम करे
मैं मूक, ना वर्णन की क्षमता।
 

स्त्री ही तुम्हारी बहना है
इस बंधन का क्या कहना है,
नए लाखों मित्र बना लो तुम
पर श्रेष्ठ उसी को रहना है।
 

स्त्री ही तुम्हारी प्रेयसी है
व्यावहारिक जीवन की शिक्षक है,
अपने स्वाभिमान का वो बलिदान करे
तेरे आत्मसम्मान की रक्षक है।
 

स्त्री ही तुम्हारी मित्र भी है
जीवन महकाता इत्र भी है,
जो मन के भीतर झांक सके
ऐसा कोई अन्यत्र भी है?
 

स्त्री ही तुम्हारा अर्ध-अंग
वो जीवन का आधार है,
सुख-दुःख, आंसू, पीड़ा, क्रंदन
प्रति क्षण वो तैयार है।
 

स्त्री का होना जीवन में
ये ईश्वर का वरदान है,
हर रूप में प्रेम की देवी है
ये देवी बहुत महान है।
 

कहलाओगे उतने सम्मानित
बस श्रद्धा से सम्मान करो,
उसकी रक्षा में जीवन दो
चाहे देवी वो अनजान हो।
 

आश्वाशन मेरा ले लो तुम
ममता के पौधे से पुष्प बन खिल जाओगे,
नवजीवन लेकर आओगे
फिर इसी प्रेम से मिल जाओगे।

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