सीमांत की व्यथा  Gaurav Rajput


सीमांत की व्यथा

Gaurav Rajput

चलो जरा हम भी चल दें,
दो कदम उठाकर राहों पर।
देखें तपते सूरज को,
ए बिखरे चांद सितारों को,
चलकर पगडंडी पर हम,
महसूस करें उन आहों को।
 

कोई जलकर है सींच रहा,
कोई तपते लोहे पीट रहा।
आओ जरा हम भी देखें,
इस बस्ती के नजराने को।
 

ईट, पत्थर, कंकड़, बालू,
सभी सड़क पर पड़े हुए हैं,
राह रोकने की खातिर,
एक दूसरे पर अड़े हुए हैं।
 

यहीं किनारे कूड़ा करकट,
और बदबू का अंबार लगा है,
मक्खी, मच्छर, छोटे कीड़े,
इनका ही परिवार बना है।
 

इतिहास नहीं इस मर्म भूमि का,
ना ही ज्योति की छाया है,
कंकालो के भार लिए हैं,
हर की अपनी काया है।
 

आज यहाँ कल वहाँ चले,
ना कोई मंजिल की आशा,
भूख मिटाने चल पड़ते हैं,
जैसे बंजर भूमि हो पानी का प्यासा।
 

अपने कर्म को भाग्य समझ कर,
चलते हैं अनजाने पथ पर,
नगर धूली को सीस चढ़ाए,
सभ्य समाज के बने हैं दर्पण।
 

कौन इनकी पतवार बनेगा ?
या धारा ही इनकी राह चुनेगा,
खडग बिना इस समर भूमि में,
मौन-मौन ही दम निकलेगा।
 

कसूर नहीं पर झेल रहे हैं,
बच्चे कीचड़ में खेल रहे हैं,
ऐसी छोटी दुनिया लेकर,
कर्म भाग्य को तौल रहे हैं।
 

आज यहाँ मुनिया जन्मी है,
पर उसकी कोई भाग्य नहीं है,
हैजा होगा या टी.बी,
या कोठे की बनेगी दासी।
 

ना घर कोई ना पता ठिकाना,
ना रास्तों का ताना-बाना,
अपने हाथों से लिखते हैं,
कूड़े पर इतिहास का गाना।
 

इसी भारत भूमि पर जन्मे,
अधिकारों से वंचित हैं यह,
वर्षों से अपमान सहा है,
पर ना कोई तम की ज्वाला है।
 

सभ्यता के इस हवन कुंड में,
जलते हैं अरमान लिए,
पर आज यहाँ परवाह किसे है,
नित बदलते अर्थ जगत में।

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