खुशियों की तलाश  Tushar Laad

खुशियों की तलाश

Tushar Laad

निकल पड़ा खुशियों की तलाश में,
उम्मीद है नहीं लौट के आऊँगा निराश मैं,
कच्ची सड़क पर गिरता संभलता,
भटकी राह से आकांक्षाओं की ओर,
पुरानी तस्वीरों से निकल
प्रसन्नताओं के उजाले की ओर।
 

बुला रहा है मकाम मुझे,
पुकार रही है मंज़िल मुझे,
जोश है पूरा रुकावटें हैं के
गूंजती हुई आवाज़ पुनः सुनाई दे गई।
मुड़ के देखा तो दिखा ना कोई मनुष्य,
फिर एहसास हुआ यह तो है केवल यादों का दृश्य,
दर्द की लहर जैसे फिर दौड़ उठी लहू में,
दिल करे विरोध, यह क्यों आखिर सहू मैं।
 

समाप्त हो गया वीर रस,
नहीं चल इस दिल पर किसी का भी बस,
दिल चाहता है आराम उन्हीं बाहों में,
लेकिन वो बाहें हो गयी हैं विलुप्त पुरानी कुछ राहों में।
 

बनने तो आई थी तुम मेहरारू,
लेकिन इस दिल को कैसे अब मैं संभालू,
क्योंकि ना हो तुम ना है तुम्हारा स्पर्श,
जाने कैसे कर पाउँगा यह जीवन स्वीकार सहर्ष।
 

करते रहेंगे प्रयास
बुझाने की यह प्यास,
खुशियों की बची ना कोई आस,
फिर भी कोशिश की लेंगे साँस।

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