बादलों की चुप्पी  RAHUL Chaudhary

बादलों की चुप्पी

RAHUL Chaudhary

नमी बादलों की चुप्पी से, खेत से जाती है,
नमी चुराकर धूप इनसे, बस दरारें दे जाती है।
 

आग से यूँ ताप के,
प्यास से मुरझाती है,
बादलों की चुप्पी से,
हरियाली खामोश पड़ जाती है।
 

फसल सूख कर लिपटी है,
अब ना चोंच का प्रहार,
है पोपट थैली फसलों की,
बस दानो का हाहाकार।
 

खोज में जल अन्न को,
छोड़े नन्हे बच्चे घर बार,
परिंदे लौटे वापस थककर,
भूखे विचरे सारा संसार।
 

कण-कण होता निर्जल सा,
जो नमी गुम हो जाए,
मृदा से उपजे जीवों की,
यूँ रूह भस्म हो जाए।
 

जलकोष भी लाचार है,
मुख पे झुर्रियाँ दरार है,
पनघट कोरा कोरा है,
बिखरा रोड़ा रोड़ा है।
 

आसार जो फुहार का,
ले आए बादलों के पार से,
संसार को यूँ मुक्त करे,
यू तोड़ बादलों की चुप्पी को।
 

कण कण को जो तृप्त करे,
हरियाली को सिंचित करे,
धरती पर अमृत बरसे,
यू तोड़ बादलों की चुप्पी को।
 

धरती का आंचल धुल जाए,
जलकोष यूँ फिर खिल जाए,
झर झर करती बूंदों को,
मांग कर ले आए बादलों की चुप्पी से।
 

पनघट पर भी शोर हो,
गाँवों में जब भोर हो,
नभ भीगे वर्षा की बहार में,
दो घूंट ही ले आए बादलों की चुप्पी से।

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