दादी की याद में  Kavita Damani

दादी की याद में

Kavita Damani

प्यारी दादी, मेरी प्यारी दादी,
चार पीढ़ियाँ सहेजने वाली,
जीवन लगता तुम बिन खाली।
 

उनकी छाया में ही बीता जीवन,
लूडो ताश खेलकर खिल गया बचपन,
ना भेद कभी किया किसी से
चाहे पोता हो या पोती,
माँ से ज़्यादा बातें तो दादी से थी होती,
घने पेड़ की छाँव चली गई,
सबकी प्यारी दादी चली गई।
 

शौक उन्हें हर चीज़ का था,
खाना, घूमना, पहनना हो,
नामंज़ूर था अपने काम में
एक पल की भी देरी हो।
न माँगा कभी किसी से,
न की कोई उम्मीद,
हर किसी को देना,
ही थी उनकी तहज़ीब।
गंगा जैसी निर्मल-स्वच्छ वो धारा चली गई,
सबकी प्यारी दादी चली गई।
 

जीवन की अंतिम दहलीज़ पर
अकेलापन उन्हें सताता था,
पर बच्चों की खबर लेने,
फ़ोन पर हाथ चला ही जाता था।
 

जीवन की इस भाग दौड़ में
शायद वक्त नहीं दे सके हम,
लेकिन अब पल-पल होता है,
इस बात का गम।
 

सबकी चिंता करने वाली,
सबको आशीष देने वाली,
हमको जीना सिखलाने वाली,
हमारी दादी चली गई।

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