बत्तीस विकास नगर  Sajal Mehra

बत्तीस विकास नगर

Sajal Mehra

हसरतों और ख्वाइशों को मुकम्मल जहाँ अब कहाँ,
छत्तों पे चादरें पड़ें, वो ज़माना अब कहाँ,
गिने तारों को रात भर यूँ ही पड़े औंधे,
सर्दियों में आग सेंके, मूंगफलियों का ज़माना अब कहाँ।
 

किताबों को पढ़ें तो अरसे बीते,
कलम में स्याही डालें, वो ज़माना अब कहाँ,
किसी गुड्डे की शादी गुड़िया से हो,
वो न्योता, वो भंडारा अब कहाँ।
 

साइकिल के टायर को गोल घुमाना बीत गया,
कटिया से बिजली का तार जोड़ना लद गया,
अब कहाँ होती है मौसिकी गुलेगुलज़ार से,
पतंगों से पेंच लड़ाएँ वो ज़माना अब कहाँ।
 

बारिशों में लथपथ भीगें, चाय कुल्हड़ की अब कहाँ,
बन मस्के से भूख मिटाएँ, मठ्ठे की थैली अब कहाँ,
वो फैमिली का टिकट ख़रीदे और बालकनी में सीट हो,
जब माँ के हाथ का तकिया हो, वो ज़माना अब कहाँ।

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