अजनबी  Tarun Kumar

अजनबी

Tarun Kumar

एक अजनबी शहर में एक अजनबी का मिलना,
उसकी बातों का सुबह शाम
अपने दिल से जिक्र करते रहना,
समझ नहीं आता क्या है? क्यों है? कैसे है?
धीरे-धीरे ये अजनबी बहुत खास हो रहा है,
लगता है फिर प्यार हो रहा है।
 

इस अजनबी में कुछ बात है,
आजकल शायद तभी तो जैसा दिन वैसी रात है।
उस अजनबी का मुस्कुराना, खिलखिलाना,
सब दिल को बड़ा अच्छा सा लगता है,
इस अजनबी शहर में भी, उसके साथ अपनापन सा लगता है।
धीरे-धीरे ये अजनबी बहुत खास हो रहा है,
लगता है फिर प्यार हो रहा है।
 

ये अजनबी अब ज़िंदगी में बहुत मायने रखता है,
दिनभर एकटक निगाहों से देखने पर भी बेदाग नज़र आता है।
उसकी दस्तक से, ज़िन्दगी में अब सुकून सा लगता है,
शायद तभी इस अजनबी शहर में,
ये अजनबी अपने दिल के पास लगता है।
धीरे-धीरे ये अजनबी बहुत खास हो रहा है,
लगता है फिर प्यार हो रहा है।

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