रात चाँदनी में  Vandana Namdev Verma

रात चाँदनी में

Vandana Namdev Verma

रात चाँदनी में, चाँद-तारों का तकना,
कि जाने किन ख्यालों में खोती गयी।

उनके पहलू में नींद इस कदर आना,
कि सपने हंसीन यूँ सजाती गयी।

नाम को अपने उनके नाम से जोड़ना,
कि वजूद को अपने मिटाती गयी।

भोर की शुरूआत शाम उनसे ही ढ़लना,
कि रात दिन उनपे लुटाती गयी।

उनके ही रंगों से खुद को रंगना,
कि रंगों की बारिश में रंगती गयी।

कभी रूठकर उनसे कभी उनको मनाना,
कि प्यार से उनको रिझाती गयी।

सात फेरों के संग सात कसमों को खाना,
कि रस्मों को सारे निभाती गयी।।

डोर मन से मन का बँध जाना,
कि दिल से दिल को मिलाती गयी।

एक लम्हा भी बिन उनके रह ना पाना,
कि जुदाई में उनके तड़पती गयी।

सुख में दुख में साथ मुश्किल में निभाना,
कि उलझनों को उनके सुलझाती गयी।

सुरों को अपने एक माला में पिरोना,
कि गीत ज़िन्दगी के गुनगुनाती गयी।

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