यादें  Premlata tripathi

यादें

Premlata tripathi

बात जो निकली कहीं उनको बताना आ गया,
मन मिले थे रूठने का तो बहाना आ गया।
 

हम अकेले ही चले जिस राह पर आजाद से,
बंधनों में साथ बँध उसको निभाना आ गया।
 

स्वप्न से बीते सुहाने दिन उसे अब याद कर,
गुनगुनाना और छंदों में सजाना आ गया।
 

नींद पलकों में ठहरती ही नहीं है आज भी,
दीप यादों के जलाकर जगमगाना आ गया।
 

प्रेम शब्दों का खजाना है हृदय यह मानिए,
शब्द मुक्ता को पिरो माला बनाया आ गया।
 

आधार छंद - गीतिका
मापनी - 2122 2122 2122 212
समांत - आना
पदांत - आ गया

 

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