थोड़ा सा जीने दो  Praveen Kumar

थोड़ा सा जीने दो

Praveen Kumar

ये कोमल पुष्प हैं, ज़रा सा तो खिलने दो,
ये वायु से तेज़ हैं, ज़रा सा बहने दो।
बने माटी के तो क्या,
खिलौना बनकर, थोड़ा सा तो जीने दो।
 

ये बगीचे की फुलवारी हैं, ज़रा सा तो महकने दो,
ये सागर की गहराई हैं, ज़रा सा तो डूबने दो।
ये दंतुरित मुस्कान हैं, जरा खिलखिलाकर हँसने दो,
गया बचपन तो क्या,
बच्चा बनकर, थोड़ा सा तो जीने दो।
 

ये सूर्य की चमक हैं, ज़रा दीपक सा जलने दो,
ये पर्वत की ऊँचाई हैं, ज़रा पत्थर सा उछलने दो।
ये पानी का सैलाब हैं, एक बूँद तो बरसने दो,
बना वृक्ष कभी तो क्या,
पौधा बनकर, थोड़ा सा तो जीने दो।
 

ये बसंत की सुंदरता हैं, ज़रा सा तो बिखरने दो,
ये सरिता की सरलता हैं, ज़रा सा तो ठहरने दो।
ये चाँद की शीतलता हैं, ज़रा सा तो ढलने दो,
बढ़ गया कद आज तो क्या,
तल से तल को मिलाकर, थोड़ा सा तो जीने दो।

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