नारी क्यों तुम ऐसा करती हो  Vandana Namdev Verma

नारी क्यों तुम ऐसा करती हो

Vandana Namdev Verma

क्यों अपने दिल को बार-बार जलाती हो,
क्यों अपने मन को तिल-तिल मारती हो।
चाहे कितना भी बदल लो तुम खुद को,
किसी की सोच को नहीं बदल पाओगी।
 

तुम बार-बार लगातार झुकती हो,
रिश्ते को अपने जी-जान से निभाती हो।
आँखों में भर-भर कर आँसुओं को,
तानों के कड़वे घूट पी जाती हो।
 

तन-मन-धन सब कुछ न्यौछावर करती हो,
भाव समर्पण का जिसके प्रति रखती हो।
प्यार के मीठे दो पल को तरसती हो,
ये कैसी ज़िन्दगी आखिर तुम जीती हो।
 

अपने अरमानों और सपनों को कुचलती हो,
अपनी सभी इच्छाओं को, क्यों त्यागती हो।
खुशियों की अपने परवाह नहीं करती हो,
फिर भी गिले-शिकवों की शीर्षक बनी रहती हो।
 

सबको संभालकर खुद क्यों नहीं संभलती हो,
स्वयं के आत्मसम्मान को ही दांव पे लगाती हो।
सही होकर भी स्वयं को ही कोसती हो,
क्यों बेवजह, बेहिसाब इल्जामों को सहती हो।

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