पीढ़ी दर पीढ़ी  suman sabhajeet yadav

पीढ़ी दर पीढ़ी

suman sabhajeet yadav

वो दिन बड़े सुहाने थे
जब तक थी नन्ही बिटिया मैं,
चहुँ ओर खिलती खिलखिलाती थी
चंचल सी चहकती थी मैं।
 

हँसती और हँसाती थी
जन-जन को गुदगुदाती थी,
तब समय बड़ा सुहाना था
जब माँ का आँगन मेरा था।
 

मेरी कली अब सुमन बनी
तुम हो दूसरे आँगन की शोभा,
ऐसा माँ ने बतलाया
हुआ माँ का घर पराया।
 

एक नया आशियाँ पाया मैंने
अपने संस्कारों से सजाया मैंने,
सीख जो दी थी माँ
जिसकी मैंने गाँठ भरी।
 

तन-मन-धन समर्पण कर भी
थक कर चूर-चूर मैं हो जाती,
ना जाने क्यों फिर भी माँ
मैं उनको खुश न रख पाती।
 

कभी रंग, कभी रूप तो कभी कर्मठता
इनसे भरी प्रताड़नाएँ थी,
हद तो तब पार हुई
जब मेरी नन्ही सी जान हुई।
 

देख उसे विचलित हुई मैं
कई सवालों की बौछार हुई,
कही मेरी यह कविता
बन जाए न उसकी रचना।

अपने विचार साझा करें




1
ने पसंद किया
289
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com