मज़दूर  Sandeep Kumar Threja

मज़दूर

Sandeep Kumar Threja

(1)
मैं वो हूँ जिसने
निज घर आँगन से पहले औरन का गृह निर्माण किया,
रेता ईंटा बालू में रम कर सेठों का बंगला निखार दिया,
स्वयं खुली धरा, नरम घास पर तरु छाया में विश्राम किया,
सुख चैनन से वंचित रह औरन को सुख का ब्रह्मांड दिया।
 

(2)
मैं वो हूँ जिसने
निज पथ से पहले औरन के पथ पर काज किया,
पथरीली राहों को अपने श्रम से हर पल आसान किया,
डगर-डगर पर आई विपदाओं का उद्यम पूर्वक नाश किया,
हर कोई मंज़िल तक पहुँचे ऐसा निस दिन प्रयास किया।
 

(3)
मैं वो हूँ जिसने
जग के अविकसित पथियारों पर तिमिर दूर कर प्रकाश किया,
पथ पर लगने वाली हर ठोकर का नाश किया,
देह को पेढी बना जग में ऊँचाईयों का आवाह्न किया,
सबके मंगल समृद्धि हेतु अपना जीवन का बलिदान दिया।
 

(4)
मैं वो हूँ जिसने
आदिकाल से महलों, आवासों व अट्टालिकाओं के निर्माण हेतु काम किया,
पथरीले पठारों, शैल शिखर व रेगिस्तानों को हर पल मात दिया,
तालाब ,नदी, नालों और समुद्र पर पुल बनाने का प्रयास किया,
नदियों को खींच कर रेगिस्थान में पानी का वास किया।
 

(5)
मैं वो हूँ जो
ढहती इमारतों के मलबे में दब जाता हूँ,
आई प्रकृतिक आपदाओं में घिर कर मर जाता हूँ,
थक कर जब भी लेटूँ पटरी पर कट भर जाता हूँ,
पीढ़ी दर पीढ़ी मज़दूर बन मिटता जाता हूँ।
 

(6)
मैं वो हूँ जिसकी
मेहनत का पैसा ये दुनिया हर दम मार लेती है,
गर मैं अपना हक माँगता हूँ तो गालियाँ हज़ार देती है,
लाखों रुपया ये सेठ चाहे रोज़ उड़ा जाते हैं,
पर मज़दूर की मेहनत के पैसे कम कर फूले ना समाते हैं।
 

(7)
मैं वो हूँ जिसको
इस जग में कई नामों से जाना जाता है,
प्रवासी, बंधुआ, श्रमिक, बाल मज़दूर कह कर पुकारा जाता है,
अचरज है कि मेरा नाम की 1 मई हर वर्ष मनाई जाती है,
मेरे कारण तो सियासतों को मौका मिलते ही गरमाया जाता है।
 

(8)
मैं वो हूँ जिसकी
इस देश को इतनी चिंता हो जाती है
मालूम नहीं मैं ही फिर भूखा क्यों मर जाता हूँ,
जग के सारे बच्चे पढ़ जाते हैं,
मेरा ही क्यों अनपढ़ रह जाता है,
मेरा घर ही क्यों हर बार टूटता और बिखर जाता है।
 

(9)
मैं वो हूँ जो
इतना सब कुछ होने पर भी एक वादा देश से कर पाता हूँ,
तुझे बनाने में अपने से भी हर जंग मैं लड़ जाता हूँ,
सदा झंडा ऊँचा रहे हमारा ऐसा सपना मैं सँजो पाता हूँ,
यही सोचकर मज़दूरी में भी गर्व कर जाता हूँ।

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