स्त्री का अस्तित्व  Manas Tripathi

स्त्री का अस्तित्व

Manas Tripathi

माँ की कोख से निकल तू विश्व में जो आई है,
समस्त सृष्टि की ऊर्जा तुझमें ही समाई है,
तू एक कोख से निकल दूजा कोख लाई है,
देवों और पिशाचों ने तेरी जयकार लगाई है।
 

तेरे कृष्ण केश से बना निशा का घोर अंधकार है,
तेरे जन्म मात्र से अवनत हुआ समाज का विकार है,
तेरी चीख जैसे दानवों को युद्ध की ललकार है,
तेरे स्वाभिमान की अग्नि में जला मर्द का अहंकार है।
 

न जाने क्यों समाज तेरे जन्म से हताश है,
जब तेरा लक्ष्य ही असुरों का विनाश है,
तेरे एक वार से गिरी कुटिल पुरुष की लाश है,
तू दुर्गा का स्वरूप है, तुझे किस अस्त्र की तलाश है?
 

आदिकाल से पढ़ी तेरे साहस की कहानी है,
तू दासी या पटरानी नहीं, तू पूरे विश्व की महारानी है,
जितना सुभग है रूप तेरा, उतनी ही मधुर तेरी वाणी है,
तू लक्ष्मी और सरस्वती है, तू साध्वी और भवानी है।
 

जिसमें देवलोक भी पराजित हुआ वह तू कर दिखाती है,
महिषासुर की सेना को तू मौत की ओर ले जाती है,
जब-जब तेरे शिशुओं पर एक खरोच भी आती है,
तब-तब तू चामुंडा बन उन्हें शत्रु से बचाती है।
 

तूने 9 मास पेट में प्रसव पीड़ा का दर्द सहा,
और फिर संग साथी ने तुझे ही निर्बल कहा?
संपूर्ण लोक में छिड़ा देव दानव का युद्ध जहाँ,
तेरे अनंत, अशेष, असीम बल ने अंत किया जंग वहाँ।
 

क्या किसी पुरुष में तेरे सामान शक्ति है?
कौन देवता है वह जिसकी तुझसे अधिक भक्ति है?
तेरे जाप के बिना क्या मिली किसी को मुक्ति है?
तेरी प्रशंसा से भरी हर पीढ़ी की एक सूक्ति है।
 

मनुष्य रूप में भी देवी, तेरे असंख्य हाथ हैं,
तेरे यश, तेज, ज्ञान से विहीन, यह सृष्टि ही निरार्थ है,
हर संपन्न पुरुष के साथ तेरा अविच्छेद्य साथ है,
सभी गुणों से श्रेष्ठ, तुझमें एक अकल्पनीय बात है।
 

तेरी प्रविष्टि से विमुख यह पुष्प भी बेजान है,
तेरे विरोधी तेरे महाकाल रूप से अनजान हैं,
पर आज किसी कोने में औरत पड़ी बेजुबान है,
कहीं क्रय-विक्रय से जूझ रही एक नन्हीं सी जान है।
 

तू उठ, तू जाग, तुझे फिर से युद्ध लड़ना है,
समाज की इन बेड़ियों से अब तुझे निकलना है,
आज मधु-कैटभ और महिषासुर को फिर पराजित करना है,
क्योंकि ऐ माँ दुर्गे ! तुझे अपना अस्तित्व नहीं भूलना है,
नहीं भूलना है।

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