हम और हिंदी | मातृभाषा - माँ भारती का श्रृंगार

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हिंदी संवैधानिक रूप से भारत की प्रथम राजभाषा है। हिंदी भाषा चीनी भाषा विश्व में सर्वाधिक समझी व बोली जाने वाली भाषा है। भारत के अलावा बहुत सारे देशों जैसे फिजी, मॉरिशियस, गुयाना, सूरीनाम और नेपाल में भी हिंदी पढ़ी, लिखी व बोली जाती है। संयुक्त राष्ट्र अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, युगांडा,सिंगापूर, न्यूज़ीलैंड, और जर्मनी में भी हिंदी समझने व बोलने वालों की संख्या लाखों में है। आज संयुक्त राज्य अमेरिका के ४५ विश्वविद्यालयों सहित पूरे विश्व के लगभग १७६ विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढाई लिखाई जारी है।

हिंदी भाषा का इतिहास लगभग १००० साल पुराना माना जाता है। हिंदी, 'हिंदी यूरोपीय' भाषा परिवार के 'हिंदी ईरानी' शाखा की 'हिंदी आर्य' उपशाखा के अंतर्गत वर्गीकृत है। हिंदी आर्य भाषाएँ वे भाषाएँ हैं जो संस्कृत से उत्पन्न हुई हैं।

हिंदी को लिखने की लिपि 'देवनागरी' है। देवनागरी में ११ स्वर व ३३ व्यंजन हैं। हिंदी बायें से दायें की और लिखी जाती है। अंग्रेजी की रोमन लिपि में जहाँ महज़ २६ वर्ण हैं वहीं हिंदी में वर्णों की संख्या इसकी लगभग दोगुनी है। हिंदी ऐसी भाषा है जिसमें शब्द को जैसा लिखा जाता है वैसे ही बोला जाता है । यही गुण इसे वैज्ञानिक भाषा बनाते हैं।

संसार की समस्त उन्नत भाषाओं में हिंदी सबसे सरल, सहज, लचीली, व्यवस्थित और वैज्ञानिक भाषा है। हिंदी विश्व की एकमात्र अपवादविहीन भाषा है। हिंदी भाषा का साहित्य विश्व की अन्य भाषाओं के साहित्य के लिए आधार साहित्य है। पूरे विश्व के भाषा विज्ञानी व विद्वानों की हिंदी साहित्य में बढ़ती रूचि इसका प्रमाण है। समय के साथ साथ वैश्विक अंग्रेजी के कथित युग में भी हिंदी सिनेमा का विश्वस्तरीय प्रसारण व विश्व समुदाय द्वारा इसे मूल भाषा में ही पसंद किया पसंद किया जाना सम्पूर्ण हिंदी सेवियों के लिए सुखद है।

मूल रूप से भाषायी आधार पर २९ राज्यों में विभक्त हम भारतीयों के लिए हिंदी महज़ एक भाषा नहीं है अपितु सम्पूर्ण भारत वर्ष को एकता के सूत्र में पिरोने का एकमात्र व सर्वमान्य कारक है। हिंदी जहाँ उत्तर भारतीयों की प्राथमिक भाषा है वहीं शेष भारत की द्वितीयक भाषा के रूप में भी सम्मानित है। इतना ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में विस्तृत भारतीयों के लिए हिंदी उनकी पहचान होने के साथ साथ उनके भारत व भारतीयता से जुड़े होने का कारण भी है।

इतनी ऐतिहासिक, समृद्ध व इतने विशाल मानव वर्ग की भाषा होकर भी वैश्विक स्तर पर हिंदी उपेक्षा की ही शिकार है। हम सभी भारतवासियों व विश्व के सभी हिंदी सेवियों को यह भान होना चाहिए कि हिंदी मात्र एक भाषा नहीं बल्कि हमारी 'मातृभाषा' है। सर्वजन सुलभ हिंदी को वैश्विक स्तर पर प्रचार-प्रसार की नहीं अपितु स्वीकार की आवश्यकता है।

हिंदी बोलने व समझने वालों की लगातार बढ़ती संख्या हिंदी को विश्वभाषा घोषित करने की प्रेरक है। भाषा विज्ञान के वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाले समय में वैश्विक स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय महत्व की जो चाँद भाषाएँ होंगी, हिंदी उनमे प्रमुख भाषा के रूप में होगी।

आज हिंदी न केवल भारतीय भाषा है बल्कि विश्वभाषा का गौरव प्राप्त करने को अग्रसर है। अतः हम सभी भारतवासियों व हिंदी सेवियों का यह पुनीत कर्त्तव्य है की हिंदी की इस यात्रा के सारथी बनकर गौरवान्वित हों जिसके फलस्वरूप हिंदी रुपी इस विशाल वटवृक्ष के सानिध्य में अन्य भारतीय भाषाएँ पल्लवित, पुष्पित व चिरायु हो सकें तथा विश्व पटल पर भारत और भारतीयता की पहचान व दम्भ अक्षुण्ण रहे।



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