करुण रस की कविताएं पृष्ठ 1 | मातृभाषा - माँ भारती का श्रृंगार

काव्यशाला - करुण रस की कविताएं

हिंदी साहित्य के करुण रस की कालजयी कविताओं का संकलन





मुझे फूल मत मारो

मैथिलीशरण गुप्त

करुण रस | आधुनिक काल

 2947  0

जो तुम आ जाते एक बार

महादेवी वर्मा

करुण रस | आधुनिक काल

 2597  0

और का और मेरा दिन

केदारनाथ अग्रवाल

करुण रस | आधुनिक काल

 931  0

इंदिरा जी की मृत्यु पर

हरिओम पंवार

करुण रस | आधुनिक काल

 1171  0

कुछ ऐसा खेल रचो साथी

गोपाल सिंह नेपाली

करुण रस | आधुनिक काल

 1241  0

सखि वे मुझसे कह कर जाते

मैथिलीशरण गुप्त

करुण रस | आधुनिक काल

 1171  0

हमारी जिन्दगी 

केदारनाथ अग्रवाल

करुण रस | आधुनिक काल

 980  0

अति अनियारे मानौ सान दै सुधारे

रहीम

करुण रस | भक्तिकाल

 692  0

मौसम की चोट

उर्मिलेश

करुण रस | आधुनिक काल

 694  0

परदेशी

रामधारी सिंह 'दिनकर'

करुण रस | आधुनिक काल

 903  0

छिप-छिप अश्रु बहाने वालों

गोपालदास ‘नीरज’

करुण रस | आधुनिक काल

 1141  0

कामना

अशोक चक्रधर

करुण रस | आधुनिक काल

 627  0

त्राहि त्राहि कर उठता जीवन

हरिवंश राय बच्चन

करुण रस | आधुनिक काल

 789  0

गुलाबी चूड़ियाँ

नागार्जुन

करुण रस | आधुनिक काल

 590  0

माता की मृत्यु पर

प्रभाकर माचवे

करुण रस | आधुनिक काल

 754  0

जी उठे शायद शलभ इस आस में

गोपालदास ‘नीरज’

करुण रस | आधुनिक काल

 343  0

मज़दूर

रामधारी सिंह 'दिनकर'

करुण रस | आधुनिक काल

 568  0

मेरा नाम लिया जाएगा

गोपालदास ‘नीरज’

करुण रस | आधुनिक काल

 519  0

ज़िन्दगी

कुँअर बेचैन

करुण रस | आधुनिक काल

 535  0

तोड़ती पत्थर

सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

करुण रस | आधुनिक काल

 570  0

विदा लाडो

कुमार विश्वास

करुण रस | आधुनिक काल

 689  0

आँगन

धर्मवीर भारती

करुण रस | आधुनिक काल

 410  0

स्पष्टीकरण

त्रिलोचन

करुण रस | आधुनिक काल

 278  0

मैं कल रात नहीं रोया था

हरिवंश राय बच्चन

करुण रस | आधुनिक काल

 686  0

जब भी इस शहर में कमरे से मैं बाहर निकला

गोपालदास ‘नीरज’

करुण रस | आधुनिक काल

 322  0

सौगन्ध बापू

पाश

करुण रस | आधुनिक काल

 283  0

नभ के नीले सूनेपन में

नामवर सिंह

करुण रस | आधुनिक काल

 325  0

यह प्रेम कथा कहिये किहि सोँ

ठाकुर

करुण रस | रीतिकाल

 308  0

दिल्ली

रामधारी सिंह 'दिनकर'

करुण रस | आधुनिक काल

 472  0

प्रार्थना बनी रही

गोपाल सिंह नेपाली

करुण रस | आधुनिक काल

 430  0




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