काव्यशाला - श्रृंगार रस की कविताएं

हिंदी साहित्य के श्रृंगार रस की कालजयी कविताओं का संकलन





तुम आयीं

केदारनाथ सिंह

शृंगार रस | आधुनिक काल

 2564  0

तेरी सुधि बिन क्षण क्षण सूना

महादेवी वर्मा

शृंगार रस | आधुनिक काल

 2236  0

मैं बनी मधुमास आली

महादेवी वर्मा

शृंगार रस | आधुनिक काल

 1354  0

संध्या के संग लौट आना तुम 

सोम ठाकुर

शृंगार रस | आधुनिक काल

 1905  0

आप का खत मिला आप का शुक्रिया

आनंद बख़्शी

शृंगार रस | आधुनिक काल

 1326  0

वसंत गीत

गोपाल सिंह नेपाली

शृंगार रस | आधुनिक काल

 1167  0

फूल

महादेवी वर्मा

शृंगार रस | आधुनिक काल

 1432  0

बादल देख डरी

मीराबाई

शृंगार रस | भक्तिकाल

 1617  0

दोहे

बालकृष्ण शर्मा 'नवीन'

शृंगार रस | आधुनिक काल

 849  0

रहीम दोहावली

रहीम

शृंगार रस | भक्तिकाल

 937  0

ऊधो जो अनेक मन होते

भारतेंदु हरिश्चंद्र

शृंगार रस | आधुनिक काल

 676  0

आज के बिछुड़े

नरेन्द्र शर्मा

शृंगार रस | आधुनिक काल

 783  0

मंगल विलय

सोम ठाकुर

शृंगार रस | आधुनिक काल

 436  0

परिचय की गाँठ

त्रिलोचन

शृंगार रस | आधुनिक काल

 433  0

तमाम उम्र चला हूँ मगर चला न गया

नक्श लायलपुरी

शृंगार रस | आधुनिक काल

 760  0

धनिकों के तो धन हैं लाखों

गोपालदास ‘नीरज’

शृंगार रस | आधुनिक काल

 770  0

अँचल के ऎँचे चल करती दॄगँचल को

पद्माकर

शृंगार रस | रीतिकाल

 391  0

जाति हुती सखी गोहन में

रहीम

शृंगार रस | भक्तिकाल

 332  0

सफ़ाई मत देना

कुमार विश्वास

शृंगार रस | आधुनिक काल

 1363  0

लौट आओ

सोम ठाकुर

शृंगार रस | आधुनिक काल

 783  0

है यह आजु बसन्त समौ

महाकवि बिहारीलाल

शृंगार रस | रीतिकाल

 436  0

खुद को आसान कर रही हो ना

कुमार विश्वास

शृंगार रस | आधुनिक काल

 916  0

क्यों इन तारों को उलझाते

महादेवी वर्मा

शृंगार रस | आधुनिक काल

 585  0

मैं प्यासा भृंग जनम भर का 

गोपाल सिंह नेपाली

शृंगार रस | आधुनिक काल

 580  0

हम तुम युग युग से ये गीत मिलन का

आनंद बख़्शी

शृंगार रस | आधुनिक काल

 448  0

आयौ जुरि उततें समूह हुरिहारन कौ

जगन्नाथदास 'रत्नाकर'

शृंगार रस | रीतिकाल

 195  0

आज उनसे पहली मुलाक़ात होगी

आनंद बख़्शी

शृंगार रस | आधुनिक काल

 685  0

पुतरी अतुरीन कहूँ मिलि कै लगि

रहीम

शृंगार रस | भक्तिकाल

 240  0

कमल के फूल

भवानी प्रसाद मिश्र

शृंगार रस | आधुनिक काल

 610  0

विदा के बाद

सोम ठाकुर

शृंगार रस | आधुनिक काल

 530  0




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