ओ री हवा | कलरव

ओ री हवा निर्मला सिंह

ओ री हवा

निर्मला सिंह

ओ री हवा, ओ री हवा,
मुझको बता अपना पता!

बोल कहाँ से आती तू,
और कहाँ को जाती तू?
मौसम के संग-साथ क्यों?
रूप बदलकर आती तू।
घर है कहाँ, जल्दी बता?
ओ री हवा, ओ री हवा!

सर्दी में शीत लहर बन,
गरमी में जाती हो तन।
लू बनकर करती हो तंग,
अजब-गजब है तेरे ढंग।
देख री ऐसे ना सता,
ओ री हवा, ओ री हवा!

आ गया बसंत आ गया,
सबको झट बतलाती तू।
फूलों से ले कर खुशबू,
दूर-दूर तक जाती तू।
देती आलस को धता,
ओ री हवा, ओ री हवा!

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