कुम्भनदास | मातृभाषा - माँ भारती का श्रृंगार

कुम्भनदास

जीवन परिचय

कुम्भनदास अष्टछाप के कवियों में से एक थे । इन्होंने सर्वप्रथम वल्लभाचार्य से दीक्षा ली थी। ये जमुनावती ग्राम के निर्धन किसान थे, किंतु कभी किसी का दान स्वीकार नहीं करते थे । राजा मानसिंह द्वारा दी गई सोने की आरसी, हजार मुद्राएँ और जमुनावती गाँव की माफी को भी इन्होंने अस्वीकार कर दिया था । सम्राट अकबर ने इन्हें फतेहपुर सीकरी बुलाया और गाने की फर्माइश की । मैले-कुचैले कपडे और फटे जूते पहने ये दरबार में पहुँचे और यह पद बनाकर गाया :

भक्तन को कहा सीकरी सों काम।
आवत जात पन्हैया टूटी बिसरि गये हरि नाम॥
जाको मुख देखे अघ लागै करन परी परनाम॥
'कुम्भनदास लाल गिरिधर बिन यह सब झूठो धाम॥

राग कल्पद्रुम और राग रत्नाकर आदि में कुम्भनदास के लगभग 500 पद प्राप्त हैं। ये मधुर भाव के उपासक थे। इनके पदों में कृष्ण-प्रेम छलकता है।

लेखन शैली

राग कल्पद्रुम और राग रत्नाकर आदि में कुम्भनदास के लगभग 500 पद प्राप्त हैं। ये मधुर भाव के उपासक थे। इनके पदों में कृष्ण-प्रेम छलकता है।

प्रमुख कृतियाँ
क्रम संख्या कविता का नाम रस लिंक
1

संतन को कहा सीकरी सों काम

शांत रस
2

भक्त इच्छा पूरन श्री यमुने जु करता ।

अद्भुत रस
3

आई ऋतु चहूँदिस

शांत रस
4

सीतल सदन में सीतल भोजन भयौ,

शांत रस
5

साँझ के साँचे बोल तिहारे।

शांत रस
6

श्री यमुने पर तन मन धन प्राण वारो ।

अद्भुत रस
7

हमारो दान देहो गुजरेटी।

अद्भुत रस
8

तुम नीके दुहि जानत गैया.

शांत रस
9

श्री यमुने अगनित गुन गिने न जाई ।

शांत रस
10

माई हौं गिरधरन के गुन गाऊँ।

शांत रस
11

कितै दिन ह्वै जु गए बिनु देखे।

शांत रस
12

बैठे लाल फूलन के चौवारे ।

अद्भुत रस
13

गाय सब गोवर्धन तें आईं।

अद्भुत रस
14

श्री यमुने रस खान को शीश नांऊ।

शांत रस
15

कहा करौं वह मूरति जिय ते न टरई।

अद्भुत रस

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