बरसाती सपने  Rahul Kumar Ranjan

बरसाती सपने

Rahul Kumar Ranjan

निकला था कल जो सूरज
सतरंगियाँ बिखेरकर। 
नहीं पता था, ढल जायेगा
काले बादल घेरकर।

तूफानी हो बरसातें जब भी 
छप्पड़ उड-उड़ जाते हैं। 
टप-टप खप्पर रिसता  है
हम अपनों से घिर जाते हैं। 

फिर मन की मंडी में ही जाकर 
कुछ नाव खरीदी जाती हैं। 
बिन मोल भाव ही रखकर खुद को 
कुछ घाव खरीदे जाते हैं।

नहीं पता था बरसाती दिन भी
इतने दुखड़े गाएँगे। 
हँसते -हँसते इन आँखों से
दो बूंद निकल कर आएँगे। 

फिर भी उम्मीदें पलती हैं
कि वो दिन भी, इक दिन आयेगा। 
अपने घर भी छतरी होगी
और नींद से, हम सो जायेंगे। 

 

अपने विचार साझा करें




2
ने पसंद किया
1318
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com