जागृति गान  Vivek Tariyal

जागृति गान

Vivek Tariyal

रणभेरी बज उठी मनुज, अब चिर निंद्रा का त्याग करो
उठो जागो हुंकार भरो, निज मोहों का परित्याग करो |
माँ भारती के लाल तुम, हिमशिखर से उद्घोष है
अब जाग जा रे नासमझ ! तू यूँ कहाँ मदहोश है ?
 

रुदन का स्वर बढ़ रहा, माँ दर्द से चिल्ला रही
स्वयं की यह दुर्दशा उससे, अब सही ना जा रही |
चिर प्रतीक्षा में तेरी, माँ हो गयी बेहोश है
अब जाग जा रे नासमझ ! तू यूँ कहाँ मदहोश है ?
 

सो रहा तू सोच कर, सब ठीक ही है चल रहा
सच यही है आज भी, तू परतंत्रता में पल रहा |
वर्तमान खुद पर रो रहा, इतिहास कर रहा अफ़सोस है
अब जाग जा रे नासमझ ! तू यूँ कहाँ मदहोश है ?
 

हर गली हर शहर में, विद्रोह ज्वाला उठ रही
धर्मों के अंतर्द्वंद में, माँ भारती है घुट रही |
माँ को मरता देख भी, क्यों चुप खड़ा खामोश है
अब जाग जा रे नासमझ ! तू यूँ कहाँ मदहोश है ?
 

आगे बढ़ो माँ के सपूतों, शत्रु को ललकार दो
काल के रथ पर चढ़ो तुम, मृत्यु को भी हार दो |
समर शंख  भी बज उठा, रवि कर रहा जयघोष है
अब जाग जा रे नासमझ ! तू यूँ कहाँ मदहोश है ?

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