अल्फाज़ मेरे होंगे  SIDDHARTHA SHUKLA

अल्फाज़ मेरे होंगे

SIDDHARTHA SHUKLA

1.
अक्षर अक्षर लिखा तुमको, मैंने एक डायरी में,
मैं अक्सर जो कहता तुमसे, कविता और शायरी में।
बिना सुरों का बिना ताल का, मैं इक गीत बेचारा था,
होठों की सरगम से छूकर, तुमने जिसे सँवारा था।
तुमसे मिलकर गीत लिखे कुछ, बस यही सोचकर मैंने,
शायद मेरे इन गीतों में, कुछ साज तेरे होंगे,
आवाज हो कोई भी लेकिन, अल्फ़ाज़ मेरे होंगे।

2.
ये भी होगा वो भी होगा क्या-क्या सोच लिया,
मैं जो थोड़ा सा बहका, क्यों न तुमने रोक लिया।
इक दिन मेरे लम्हों को तेरी आदत सी हो जाएगी तब,
तुम खुश रहना मैं खुश हूँ बस यही सदा ही आएगी तब।
फिर मुझसे नजर मिलाने में भी, कई एतराज़ तेरे होंगे,
आवाज हो कोई भी लेकिन, अल्फ़ाज़ मेरे होंगे।

3.
और शाम जब ढलते ढलते याद हमारी आएगी,
तेरे चुलबुल से चेहरे पर इक ख़ामोशी छाएगी।
आँसू नहीं निकल पाएँगे जब छोटी बहना भी होगी,
तुमको गुमसुम देख कहेगी, आखिर हुआ है क्या दीदी।
आँसू को पलकों में ढककर मुस्काना, ये अंदाज तेरे होंगे,
आवाज हो कोई भी लेकिन, अल्फ़ाज़ मेरे होंगे।

4.
और सुनो वो दिन आएगा, जब हम साथ नहीं होंगे,
हाथ तो होंगे दोनों पर, हाथों में हाथ नहीं होंगे।
तब फिर तेरा साथ निभाने, कोई दूर देश से आएगा,
यही गीत और यही शायरी कोई और सुनाएगा
तुम भी उससे कह देना, जो राज तेरे होंगे…….क्योंकि………
…..आवाज हो कोई भी लेकिन, अल्फ़ाज़ मेरे होंगें।

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