ना आएगी अब चन्द्रिका  SIDDHARTHA SHUKLA

ना आएगी अब चन्द्रिका

SIDDHARTHA SHUKLA

है मुग्ध तू क्यों ऐ पथिक यह रेत में मारीचिका,
लड़ आज सूरज से ज़रा ना आएगी अब चन्द्रिका।
 

तू राह किसकी तक रहा कोई नहीं है साथ में,
तुमको बनानी है स्वयं किस्मत तुम्हारे हाथ में।
इस रेत में भी आज मरूद्यान तुमको ढूँढना,
सूरज बहुत ही तेज़ है अभिमान इसका तोड़ना।
शेष जीवन में नहीं कारण कोई आसक्ति का,
लड़ आज सूरज से ज़रा ना आएगी अब चन्द्रिका।
 

स्वेद से लथपथ है तू सब चाहते हैं रोकना,
राह के पत्थर सभी हैं कर रहे आलोचना।
जल तृषा है किन्तु मेघों से न कर तू याचना,
वायु के भी शीत होने की नहीं सम्भावना।
अब करो घनघोर तुम इक आह्वाहन शक्ति का,
लड़ आज सूरज से ज़रा ना आएगी अब चन्द्रिका।
 

औकात क्या तूफ़ान की तुमको सम्भाले राम है,
तूफ़ान तुझमें पल रहे सागर तुम्हारा नाम है।
तुम रेत ना हो जो हवा तुमको उड़ा ले जायगी,
अट्टालिका है सिद्ध तू तुमको हिला ना पायगी।
तू जीत जाएगा यहाँ यह आज सबको दे दिखा,
लड़ आज सूरज से ज़रा ना आएगी अब चन्द्रिका।

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