बिखरने के लिए  SIDDHARTHA SHUKLA

बिखरने के लिए

SIDDHARTHA SHUKLA

लड़कियों से कम नहीं होती लड़कों की दिक्कतें.
हाँ, पर लड़कियों जैसी नहीं होती लड़कों की दिक्कतें।
जिस्म को छुपाना नहीं होता, उतना
समाज की अतार्किक
पाबंदियाँ भी नहीं होतीं।
 

लड़के रो नहीं सकते, क्यों?
लिंग के आधार पर,
भावनाएँ बँट गयीं क्या?
लड़कों की मुस्कुराहट उतनी दिलकश नहीं होती।
दर्द भी तो नहीं दिखता, होंठों पर?
सब नहीं “शेयर” करते “फेसबुक” पर
“टाइनी टेल्स”
क्योंकि अँधेरा “टाइनी” नहीं होता।
हाँ, मगर उम्मीद छोटी सी होती है।
ये नाचते-गाते खिलखिलाते लड़के
अंदर से अकेले हैं,
कोई इनके अंतर्मन को नहीं छूता
इनकी परेशानियाँ सबकी सोच से परे हैं।
 

बचपन की राजा बाबू वाली संज्ञाएँ-
दब गयीं हैं जिम्मेदारियों के विशेषणों में।
लड़का होना अच्छा है,
मगर अच्छा लड़का होना अच्छा नहीं।
क्योंकि तब तुम सोचोगे-
सुबह नहाते वक्त, मेस में चुपचाप खाते हुए
कक्षा में सोते हुए, सिर्फ एक सवाल।
क्या तुम वो कर रहे हो जो तुम करना चाहते हो?
क्या तुम्हारे होने का मतलब भी है?
मुझे पता है तुम्हारे पास जवाब नहीं।
होगा भी तो देना नहीं चाहोगे?
 

तुम सबकी उम्मीद बन चुके हो,
तुम्हारा ज़मीर उन उम्मीदों को ,
टूटने नहीं देगा,
क्योंकि तुम अच्छे लड़के हो।
तुम हथियार डालोगे तो आ जाएगा फिर से कोई कृष्ण
उपदेश सुनाने,
मगर तुम्हारी नहीं सुनता कोई, तुम कहना नहीं चाहते।
हाँ, शायद तुम सोचते हो,
जो तुम कहना चाहते हो उसे सुनकर सब हँसेंगे?
 

भूल जाओ सबको कह दो,
क्योंकि अब,
तुम बिखरना चाहते हो।
मगर फिर वही बात लड़के मजबूत होते हैं
दिल से, मगर
बिखरने के लिये कागज़ अच्छा है, पर
बिखर कर हाशिये से बाहर ना जाओ, क्योंकि
तुमपर किसी का अधिकार है
शायद नौ महीने का अधिकार।
 

क्या तुम्हारे बाद समस्या खत्म हो जाएगी?
नहीं… तो फिर रुको.
वापिस चलो देखो, इंसानियत जिन्दा है
दोस्त हैं, शायद तुमने ढूंढें नहीं
लोग सुनेंगे तुम कहो तो, मैं सुनूँगा
कहने से डर लगता है तो लिखो, क्योंकि
बिखरने के लिये कागज़ अच्छा है।

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