याचक Devendra Raj Suthar

याचक

Devendra Raj Suthar

मैं याचक की तरह
तुझे माँगता रहा
और वो अपनी
ज़िद पर अड़ा रहा
तू पपिहरा बन
बिलखती रही
मैं चातक बन
तड़पता रहा
प्रिये ! तुम बिन
ये बसंत अब
बसंत नहीं लगता
हरीतिमा में भी अब
हरा रंग नहीं दिखता
कैसे संभलूँ !
इस दर्द के मंज़र में
बढती जा रही है
जहाँ विकलता
और तुमको ना पाने की
आखिर कैसी विवशता ?
जिंदगी हो तुम तो प्रिये !
अब बताओ !
कैसे मैं जी पाऊंगा ?
पल-पल दम घुटता है
क्या मैं शेष रह पाउँगा ?

अपने विचार साझा करें




0
ने पसंद किया
837
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com