ज़रूरत  Anurag Jaiswal

ज़रूरत

Anurag Jaiswal

सुर्ख आसमान की तरफ निगाहें थी,
आशाओं की बनी कई लड़ियाँ जुड़ी जाती थी,
उस अपरिमित सागर के हर एक कोने को टटोलती, बिछती जाती रही,
तुम जो होती तो दिखाता की कितने सपने बुन के टाँगे हैं
इन लड़ियों के सहारे, वो लटके हुए हैं झूमते,
किस किस्सागोई से लिखा है मैंने तुम्हारे मेरे बारे में,
और कितने रंग भरे हैं हर एक तूलिका में।
 

हर किस्से में बस दो ही जाने हैं,
मगर हर बार वो विस्मृत करेंगी तुमको
और हर बार वो तुमको ये एहसास दिलाएँगी,
ज़िंदगी का हर एक साँचा नया है, और नए हैं रंग भी,
नई है हर सुबह की गूंज और नए हैं जीने के ढंग भी।
 

जरूरत होगी कि तुम ये सारी उलझनें छोड़ो,
हो उन्मुक्त उड़ चलो मेरी भावनाओं पे,
जो देखना चाहती हो हर एक चित्र इन लड़ियों का, तो ये सारी बन्दिशें तोड़ो,
छोड़ दो वो हर एक हिचक जो बाँधती है और साँसे भूलकर संग मेरे दौड़ पड़ो।
 

देखना ये तुम्हारे देखे बिना ये न धुलेंगी,
तूफान झंझावात की हर एक शय से लड़ेंगी,
लड़ेंगी प्रकृति की हर क्रूरता से, करेंगी इंतज़ार तुम्हारा निरंतर,
जरूरत होगी की तुम इतनी तो रहमत बक्शो,
एक बार तो स्पर्श अपना छोड़ जाओ,
एक बार तो एहसास अपना छोड़ जाओ।

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