मेरी आवाज़  VIKAS UPAMANYU

मेरी आवाज़

VIKAS UPAMANYU

सुनो अब तुम मेरी आवाज सुनो,
व्यथा मेरे मन की हर बार सुनो।
 

कल लूटा था उसने मेरा मन-अंतरमन,
उजड़ गया है सब, सजा कर उसका चिलमन।
क्यों इतना निर्मम हो गया वो मेरा हरजाई,
है आज भी मुझमे उसकी अलौकिक परछाई।
सोचता हूँ तो बर्फ से सिल्ली हो जाता मेरा मन,
देखा था, चाहा था, छुआ था जब उसने मेरा तन मन।
सुनो अब तुम मेर आवाज सुनो,
व्यथा मेरे मन की हर बार सुनो।
 

भरा था कभी प्यार उसने मेरी रगों में,
आ गया था तब अलौकिक तिलस्म मुझमे।
अब वो रगों में बहता प्यार खफा हो गया,
जब देखकर उसने मुँह मोड़ लिया।
लेकिन पहचान उसमे आज भी हमारी बाकी है,
इसलिए हम भी मान चुके खुद को एकाकी हैं,
मन नहीं अंतरमन भी अब मेरा सन्यासी है।
चलो जो भी हो अब उसका यूँ अपमान ना करो,
मान है वो मेरा अब उसका सम्मान करो।
सुनो अब तुम मेर आवाज सुनो,
व्यथा मेरे मन की हर बार सुनो।

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