खो गया रामराज्य ज़ुर्म के अँधेरे में  RATNA PANDEY

खो गया रामराज्य ज़ुर्म के अँधेरे में

RATNA PANDEY

हे राम कहाँ हो तुम,चले आओ,
हज़ारों अबलाएँ पुकार रही हैं तुम्हें,
जो घिरी हैं गुनाहों के चक्रव्यूह में।
हज़ारों वृद्ध पुकार रहे हैं तुम्हें,
जो वृद्धत्व अपना गुज़ार रहे हैं,
वृद्धाश्रम के आँगन में।
जहाँ तुम थे वहाँ रामराज्य होता था,
यह हमने सपने में देखा था,
किन्तु आँख खुलते ही यहाँ हैवानों का मेला था।
 

सीता तो पवित्रता के साथ लौटी थी,
किन्तु इन्सान तो रावण से भी बदतर है,
नहीं बक्शता वह कभी अबला नारियों को,
नहीं सुनता कभी चीखें नन्हीं सी जानों की।
दरिन्दगी के चोले में छिपे यहाँ इन्सान होते हैं,
वासना के नशे में लिप्त ये हैवान होते हैं,
हे प्रभु! इस धरा पर एक बार फिर से आ जाओ,
शालीनता का पाठ इन्सानों को पढ़ा जाओ।
 

है यह वही जन्मभूमि तुम्हारी,
जहाँ रामराज्य होता था,
खुशियों से जगमगाता साम्राज्य होता था।
खो गया वह रामराज्य ज़ुर्म के अंधेरों में,
बन गया इतिहास किताबों के पन्नों में,
नहीं कोई राम नहीं लक्ष्मण,
यहाँ सब रावण ही दिखते हैं,
इन्सान के मुखौटे में छिपे,
स्वार्थ के पुतले ही मिलते हैं।
 

मानकर आज्ञा पिता की तुम वनवास गए थे,
सुख वैभव सब त्याग,
सिर्फ पिता का आशीर्वाद ले गए थे।
वृद्ध हो चले माता पिता को यहाँ,
वृद्धाश्रम का वनवास मिलता है,
वापस आने की तारीख़ का नहीं,
नामोनिशान मिलता है,
स्वर्गवास के पश्चात ही,
वनवास उनका समाप्त होता है।
फिर भी बात यह, वह सबसे छुपाते हैं,
और अपने लाड़लों को अपमानित होने से बचाते हैं।
हे प्रभु! एक बार इस धरा पर फिर से आ जाओ,
संतान के कर्त्तव्य पथ का मार्ग,
उन्हें फिर से दिखा जाओ।
 

नहीं आ सकते अगर तुम,
तो हनुमान को ही पहुँचा दो।
बचाने के लिए अबलाओं को,
वह जुर्म की लंका में आग लगा देंगे,
ज़ालिमों के इरादों को निष्फल बना देंगे।
किन्तु हनुमान को तुम यह बता देना,
धरा पर एक रावण नहीं,
रावणों का मेला है,
और हर गली में बसा लंका का डेरा है।
निर्लज्जता देखकर इन्सान की,
देखना वह खुद ना घबराएँ,
और उल्टे पांव स्वर्ग को वापस ना चले जाएँ।
 

आदेश मानकर श्री राम का,
हनुमान धरा पर चले आए,
देखकर यहाँ का हाल वह बहुत पछताए।
क्या-क्या सुधारूँगा यहाँ,
सब कुछ ही तो बिगड़ा है,
किंकर्तव्यविमूढ़ से होकर,
वह स्वर्गलोक को लौट आए
और श्री राम से बोले,
हे प्रभु! हज़ारों रावण भी होते,
तो मैं जीत कर आता,
किन्तु इन्सानों की हैवानियत देखकर,
मेरी आँखें शर्म से झुक गईं,
नज़र ऊपर ना उठा पाया,
क्षमाप्रार्थी हूँ प्रभु मैं कुछ ना कर पाया,
मैं कुछ ना कर पाया।
देखकर हनुमान की हालत,
भगवान श्री राम भी डर गए होंगे,
और रामराज्य फिर से बसाने की तमन्ना,
दिल में ही दफ़न कर गए होंगे,
और रामराज्य फिर से बसाने की तमन्ना,
दिल में ही दफ़न कर गए होंगे।

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