सूर्य की चेतावनी RATNA PANDEY
सूर्य की चेतावनी
RATNA PANDEYनहीं तपता था कभी पहले मैं ऐसे,
कष्ट होता है मुझे भी तपने में ऐसे,
नहीं है दोष मेरा, सभी इस युग की माया है,
इन्सान ने स्वर्ग सी धरती को,
कचरे का घर बनाया है।
मुस्कुराते लहलहाते वृक्षों को
काटकर अपाहिज बनाया है,
बहती हुई प्राण वायु को भी
दम घुटने का जरिया बनाया है।
नहीं बख्शा सरिताओं को,
अपने पाप का घड़ा उसमें बहाया है,
देश के रक्षक पर्वतों को,
काट-काटकर छोटा बनाया है।
यह सब साथी हैं मेरे,
सदियों से इन्हें मैं जानता हूँ,
और हर रोज़ आकर ऊपर से उन्हें मैं निहारता हूँ।
आँख भर आती है मेरी उनकी दुर्दशा देखकर,
कान सुन नहीं पाते हर प्रहर उनका रुदन,
हर रोज़ आपबीती वह मुझको सुनाते हैं,
और मेरे समक्ष आँसू बहाते हैं।
ब्रह्माण्ड में सबसे शक्तिशाली हो रवि तुम,
करके कुछ जतन तुम हमको बचालो,
ऐसी उम्मीद वह मुझसे लगाते हैं।
समझ नहीं पा रहे यह लोग किस ओर जा रहे हैं,
बरबाद करके हमें,
यह स्वयं के जीवन के पल घटा रहे हैं।
सुनकर फरियाद सभी की,
सूर्य का धैर्य खो जाएगा,
झुलसा कर रख देगा
यदि अपनी वाली पर आ जाएगा।
संभल जाओ सूर्य के धैर्य का इम्तहान मत लो,
अभी तो दे रहा है चेतावनी,
नहीं समझे अगर,
नहीं संभले अगर,
नहीं सुधरे अगर,
तो जलाकर भस्म कर देगा।
चिता में अग्नि की ज़रूरत ही नहीं होगी,
सूर्य अपनी गर्मी से ही जलाकर राख कर देगा।
सूर्य अपनी गर्मी से ही जलाकर राख कर देगा।
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भगवान द्वारा बनाई गई प्रकृति को इन्सान अपने स्वार्थ हेतु नष्ट कर स्वयं के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहा है। सूर्य की गर्मी प्रति वर्ष बढ़ती ही जा रही है और वह दिन दूर नहीं जब धूप और गर्मी के कारण जीना भी मुश्किल हो जाएगा। काश इन्सान आज भी संभल जाए ,सुधर जाए तो आने वाले विनाश को रोका जा सकता है। अपनी कविता के माध्यम से मैंने यही बात स्पष्ट करने का प्रयास किया है।
