क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए  Ravi Panwar

क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए

Ravi Panwar

क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए,
मौसम तो नहीं फिर भी बदल गए,
तुम्हें पाने को हम, मोम सा पिगल गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

दरिया था कितना अंदर, फिर भी बाहर न आया,
सूखे किनारों से, एक आंसू छलक न पाया,
आज तुमको देखा हम फिर मचल गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

जानता हूँ तुमको, एक तजुर्बा मानता हूँ तुमको,
एहसान मानो मेरा, अभी भी पहचानता हूँ तुमको,
खिलती रही शमाएँ, और कितने परवाने जल गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

फिर इन्ही गलियों में हवा खाने आए हो,
क्या इरादा है, किसे मनाने आए हो?
फिसलन नहीं थी हम फिर भी फिसल गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

शहनाइयों का शगुन तेरे घर पर भी पहुँचा,
एक लिफाफा शादी का मेरे घर पर भी पहुँचा,
कुछ ही पल में हम दोनों के रास्ते बदल गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

नई थी जिंदगी, एक नया सफर इकरार कर रहा था,
कोई मेरे इंतज़ार में आँखें चार कर रहा था,
मेरी कब्र के ऊपर मानो फूल खिल गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

घूंघट का सब्र देखो, कौन ख़फ़ा था उससे,
जो वफ़ा न मिली तो बेवफा था उससे,
जो उठी वो नज़र, मेरी थी मगर,
जब उसने कहा मैं यही हूँ जफर,
वक़्त था बेरहम, कितने धागे उलझ गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।
 

वो लहर तेज़ थी मैं बह न सका,
उन्हें देखे बिन अब रह न सका,
हँसी थी लबों पे, दिलो में समंदर,
वो ही सामने था, जो था मेरे अंदर,
हम थे सफर अब हमसफ़र बन गए,
क्यूँ आज फिर तुम मुझको मिल गए।

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