पिता  VIKAS UPAMANYU

पिता

VIKAS UPAMANYU

सुनो, पिता कौन है
यह आज मैं तुमको बतलाता हूँ,
ऋणी हूँ मैं जिनका
उन भगवान की गाथा सुनाता हूँ।
 

हैं वो संघर्षों का भंडार,
सब बच्चों के लिए सह जाता है,
लगता है उसके जख्मो में नमक,
फिर भी देखो कैसे मुस्कुराता है।
 

इस मतलबी दुनिया में
एक वही खेवट बन नैय्या पार लगाता है,
सींच देता है अपने लहू से बच्चों के जीवन को,
ऐसे ही नहीं कोई पिता कहलाता है।
 

देख शोहरत बच्चों की जो गद्-गद् हो जाता है,
बेच देता है अपना कतरा-कतरा,
जो बच्चों को खुद से आगे देखना चाहता है।
 

सुनो, पिता कौन है
यह आज मैं तुमको बतलाता हूँ,
ऋणी हूँ मैं जिनका
उन भगवान की गाथा सुनाता हूँ।
 

पिता ही है तारण-हार हमारा,
पिता ही जीवन का सहारा है,
शून्य है हम बिन उसके, क्या वजूद हमारा है।
झेलता है अनगिनत तूफानों को,
ऐसी ही नहीं पिता परमेश्वर कहलाता है।
 

कटती है रातें कैसे उसकी
धूप में जब वो जल जाता है,
देख उसके हाथों के छाले
मेरा तो दिल दहल जाता है।
फिर भी कभी नहीं रुकता अपने पथ से,
यू ही नहीं वो पिता कहलाता है।
 

नतमस्तक है ‘उपमन्यु’ पिता तुम्हारे चरणों में,
नहीं चुका सकता क़र्ज़ तुम्हारा, अगले सौ जन्मों में।

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