जीवन प्रवाह  SUBRATA SENGUPTA

जीवन प्रवाह

SUBRATA SENGUPTA

पल दो पल के जीवन को
स्वतंत्र बहने दो,
भले ही कमलपत्र पर
नीर की तरह हो।
 

समीर के झोखों से लोहा लेने दो,
जीवन तरल है, जो कोमल है,
जो कणों में टूटा हुआ है,
जो आदि से ही टूटा हुआ है,
वह टूटने से निर्भय है,
उसे अपने अस्तित्व को
समझने दो,
निर्भय सा उन्मुक्त बहने दो।
 

अटल मृत्यु पाषाण से टकराने दो,
कोमल प्रहार से मृत्यु पाषाण को
रेत कणों में बदलने दो,
पल दो पल के जीवन को
स्वतंत्र प्रवाह से बहने दो।
मृत्यु पर विजय प्राप्त करने दो,
पर्वत से निर्भय निर्झर बनकर
झरने दो,
कल-कलरव से सतत बढ़ने
का गीत गाने दो।
 

जनसागर के उपवन में
सम-विषम खाइयों को पाटकर,
सुमन बनकर सौरभ बिखेरने दो।
बादल बनकर तपती धरती की
प्यास बुझाने दो,
नील गगन तले, धरती पर पले,
जख्मी ह्रदय में स्नेह-मलहम मलने दो।
हर एक ह्रदय में इंद्र धनुष के रंग,
रंगने दो,
पल दो पल के जीवन को
स्वतंत्र प्रवाह से बहने दो।

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