पालनहार  RATNA PANDEY

पालनहार

RATNA PANDEY

ख़्वाहिशों की लंबी कतार
पालनहार इक अकेला
कैसे करता है ना जाने,
पूरा ख़्वाहिशों का मेला,
ज़िम्मेदारियों का बड़ा बंडल
सर पर लेकर घूमता है,
उफ़ नहीं करता कभी
हर तकलीफ़ अकेले झेलता है,
दिखने नहीं देता पाँव के छाले
दर्द तन्हा सह लेता है।
 

कर परिश्रम, स्वेद से अपने
परिवार को वह सींचता है,
संकट कोई परिवार पर हो
तो संकट मोचक बन जाता है,
स्वार्थ नहीं कोई उसका
लेना कुछ भी नहीं चाहता,
देकर अपना सर्वस्व
पिता का पूरा दायित्व निभाता है,
इसीलिये पिता ही परिवार का
पालनहार कहलाता है।
 

जिया सदैव परिवार की खातिर
स्वयं के लिये कभी नहीं जिया,
आँखों में जो भी सपने देखे,
सपनों में बस अपने देखे,
अपनों के ख़्वाब सुनहरे देखे।
ख़्वाबों को पूरा करने में
जीवन पूरा लगा दिया,
पिता का जो फर्ज़ था पूरा
तन मन धन से निभा दिया।

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