इंसान तो नहीं हो सकते हैं  VIVEK ROUSHAN


इंसान तो नहीं हो सकते हैं

VIVEK ROUSHAN

क्यों आज इस अमन-चैन वाले देश में
नफरत का माहौल बन रहा है,
क्यों इस वतन की हवाओं में
खौफ के ज़हर को घोला जा रहा है,
क्या बदल गया है पिछले कुछ सालों में,
क्या दिन बदल गया है या रात बदल गई है,
क्या जो सरकार के पक्ष या विपक्ष में है
उस हर इंसान के हालात बदल गए हैं,
क्या जो कल तक झोपड़ी में रहते थे
वो महलों में रहने लगे हैं,
क्या जो कल तक मज़दूरी करते थे
वे मालिक बन गए हैं,
क्या जो कल तक किसान थे
वे जमींदार बन गए हैं,
नहीं ऐसा तो कुछ भी नहीं हुआ,
इन आँखों ने ऐसे मंज़र तो नहीं देखे।
 

इन आँखों ने आज भी गरीबो को
झोपड़ी में देखा है,
कारखानों में
मज़दूरों को देखा है,
खेतो में
किसानो को देखा है,
गर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ
तो फिर इनकी खुशियों के गूंज तो नहीं होगी,
इस वतन की हवाओं में
तो फिर कौन कोलाहल मचा रहा हैं?
कौन चीख रहा है, चिल्ला रहा हैं?
कौन हमारे वतन की हवाओं को दूषित कर रहा है?
कौन हमको और आपको आपस में लड़ा रहा है?
कौन हमारे बीच के अपनत्व को ख़त्म कर रहा है?
वो कौन लोग हैं
जिनको हमारी तरक्की से ज्यादा विनाश अच्छा लगता है?
वे कौन लोग हैं
जिनको मोहब्बत से ज्यादा नफरत करना अच्छा लगता है,
ये गरीब, मज़दूर और किसान तो नहीं हो सकते हैं,
इनके अलावा जो भी होगा
वो इंसान तो नहीं हो सकते हैं,
वे इंसान तो नहीं हो सकते हैं।

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