मैं भी तुम हूँ  RAHUL MAHARSHI


मैं भी तुम हूँ

RAHUL MAHARSHI

दाना चुगने उड़ आया,
वापस कभी ना मुड़ पाया,
ओ प्रवासी पंछी,
मैं भी तुम हूँ,
मैं भी तुम हूँ।
 

छोड़ घोंसला, मात पिता,
भाई बहन और बाल सखा,
नए देश के नए सरोवर
नभ को छूने मैं आया।
ओ प्रवासी पंछी,
मैं भी तुम हूँ,
मैं भी तुम हूँ।
 

नव-आभास, नव-चेतन,
नया-नया सब लगता है,
रोज़ बारिश होती है
इंद्रधनुष चमकता है।
फिर भी क्यों मैं गुमसुम हूँ?
ओ प्रवासी पंछी,
मैं भी तुम हूँ,
मैं भी तुम हूँ।
 

क्षणभंगुर थी वो तृष्णा,
क्षणभंगुर था वो मोहपाश,
उज्जवल भविष्य के चक्कर में
वर्तमान का हुआ विनाश।
क्या तुम भी हो व्याकुल यूँ?
ओ प्रवासी पंछी,
मैं भी तुम हूँ,
मैं भी तुम हूँ।
 

अनावश्यक आवश्यकताएँ,
अनभिज्ञ फँसा मैं अविवेक,
ऐश्वर्य की चकाचौंध ने.
प्रहार किए मुझपर अनेक।
क्या उड़ नहीं पाते तुम अब,
क्या तुम भी हो गए बिन पंख यूँ?
ओ प्रवासी पंछी,
मैं भी तुम हूँ,
मैं भी तुम हूँ।
 

आते हो तुम शरद ऋतु
ऊड़ जाते हो ग्रीष्मकाल,
मरिचीका के मारे हम तुम
गमनागमन का है ये बवाल।
क्या कोई समझ तुझे पाता है,
क्या कहता मैं साथ हूँ?
ओ प्रवासी पंछी,
मैं भी तुम हूँ,
मैं भी तुम हूँ।
 

एक वर्ष में एक ऋतु तुम
वापस जा तो पाते हो,
मेरा क्या मैं एक अभागा
दिशा भ्रमित हो जाता जो।
ना जाने क्यों हूँ अचल मैं,
क्यों नहीं उड़ पाता हूँ?
ओ प्रवासी पंछी,
मैं ना तुम हूँ,
मैं ना तुम हूँ।

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