खिला क्यों नहीं देते  शशांक दुबे

खिला क्यों नहीं देते

शशांक दुबे

मैं हिन्दू तू मुसलमां ये सिख वो ईसाई,
क्यों झगड़े आपस में जब हैं भाई-भाई,
सब का खून आपस में मिला क्यों नहीं देते?
उजड़े हुए गुलशन को खिला क्यों नहीं देते?
 

जो वतन की आन खातिर जान देते हैं,
मातृभूमि को जो ऐसा सम्मान देते हैं,
उनकी देशभक्ति को सिला क्यों नहीं देते?
उजड़े हुए गुलशन को खिला क्यों नहीं देते?
 

कहीं भगवा ही छाया है, कहीं हरा समाया है,
कहीं नीला, कहीं पीला रंग ये क्यों बिखराया है,
इन सब रंगों को आपस में मिला क्यों नहीं देते?
उजड़े हुए गुलशन को खिला क्यों नहीं देते?

अपने विचार साझा करें




1
ने पसंद किया
874
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com