तो क्या मिलने आओगी?  Akshar Arora

तो क्या मिलने आओगी?

Akshar Arora

अगर मैं कब्र में सो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
अगर कुछ न कहूँ और खो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
 

अगर तुम्हारी नफरत को भी सीने से लगा रख लूँ तो,
अगर तेरे सब झूठों को सच के साए से ढक लूँ तो,
अगर मैं कह दूँ मुझको भी तुमसे मोहब्बत अब रही नहीं,
ये कहते-कहते रो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
 

अगर तेरी मजबूरी के सब बदल छँट जाएँ तो,
अगर रास्ते से तेरे हम खुद से ही हट जाएँ तो,
अगर मैं जाते-जाते फिर भी बन के बरखा बरसूँ तुझ पर,
और गम सब तेरे धो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
 

अगर राख मेरी तेरे आँगन की मिट्टी में मिल जाए तो,
अगर उसी राख की मिट्टी में कोई बीज कली खिल जाए तो,
अगर उसी कली के साए-साए देखूँ तुझको छुप-छुप कर,
और फिर फूल में उसका हो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
 

अगर सर्द हवा ठंडी-ठंडी याद तेरी दिलवाए तो,
अगर तेज बरसती बारिश में भी दिल मेरा जल जाए तो,
अगर फिर मैं आ जाऊँ ज़िद पर और कह दूँ बस तुम मेरी हो,
और सब दुःख तेरे धो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
 

अगर मैं कब्र में सो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?
अगर कुछ न कहूँ और खो जाऊँ, तो क्या मिलने आओगी?

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