बंदिशें  RATNA PANDEY

बंदिशें

RATNA PANDEY

छनक रही थी पायल मेरी जब गृहप्रवेश कर आई थी,
खनक रहीं थी चूड़ियाँ जब हल्दी की छाप लगाई थी,
खुशबु से गजरे की मेरे महक रहा था घर आँगन,
बड़ा प्रफुल्लित था हिलोरे मार रहा था मेरा मन,
नाच रहा था तन मन उमंगों से था भरा,
स्वर्ग से भी सुन्दर मेरा घर था लग रहा।
 

वक़्त ने ली करवट बदलने लगा यहाँ सब अब,
जब वक़्त आया पीहर जाने का मेरा तब
स्वर्ग मेरा गुमसुम सा लगने लगा,
जब जाने का वक़्त निकट मेरा आने लगा,
तभी कानों में मेरे फुसफुसाहट सी आई,
कौन संभालेगा यहाँ,
अभी कुछ दिन पहले ही तो है आई,
रज़ामंदी भी नहीं ली हमसे,
यह तो मनमानी पर है उतर आई।
 

रुक गए तब पाँव मेरे पायल जंज़ीर बन गई,
हाथों की चूड़ियाँ खनकने से रुक गईं,
गजरे की खुशबु से दम घुटने लगा,
मन दुख के सागर में मेरा डूबने लगा,
बंदिशें हैं यहाँ कितनी समझ में मुझे आने लगा।
 

उत्सुक थी बड़ी कि पीहर जाऊँगी मैं,
परिवार से अपने गले लग पाऊँगी मैं,
अनजान थी मैं यहाँ के कायदों से,
बुलाते हैं खुद की बेटी को,
किन्तु बहू पर लगाते हैं बंदिशें।
 

पच्चीस वर्ष बिताए जिस परिवार में,
छत्र छाया में जिनके पली,
क्या भूल जाऊँ मैं उनकी गली?
क्यों भूल जाऊँ मैं उनकी गली?
क्यों हैं इतनी बंदिशें कि लेनी पड़ रही है अनुमति।
 

पायल को तुम मेरी बेड़ियाँ ना बनाओ,
माना था जिसे स्वर्ग उस घर को पिंजरा ना बनाओ,
कैसे निकल पाऊँगी छटपटा रही हूँ मैं,
कैसे गले लग पाऊँगी परिवार से व्याकुल हो रही हूँ मैं,
छोड़ा नहीं है दामन मेरे परिवार का मैंने,
ब्याहकर आई हूँ यहाँ एक नया बंधन बाँधकर मैं।
 

डोली में किया है परिवार ने बिदा मुझको,
चाहती हूँ कि अंतिम साँस तक रिश्ता मैं निभा पाऊँ,
जिस घर में आई हूँ उसे भी मैं संवार पाऊँ,
मत लगाओ पाबंदियाँ ताकि मैं भी स्वतंत्र रह पाऊँ,
डोली में विदा होकर आई हूँ मैं,
उसे डोली ही रहने दो,
मेरी अर्थी ना बनाओ कि वापस जा ही ना पाऊँ
कि वापस जा ही ना पाऊँ।

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