जी हाँ मैं कविता हूँ  RATNA PANDEY

जी हाँ मैं कविता हूँ

RATNA PANDEY

विचारों का है बड़ा मंथन
लाखों मस्तिष्क में घूमता है,
भावनाओं का पिटारा है बड़ा गहरा
कोई मोती उठाता है।
 

कोई इतिहास में डुबकी लगाता है,
कोई भविष्य के सपने दिखाता है,
कभी नारी को देवी दिखाता है,
कभी नारी की आबरू लुटती दिखाता है।
 

सैनिकों की वीर गाथाएँ कोई हर रोज़ सुनाता है,
हर घटना मुझमें कैद होती है,
कठपुतली मैं बनी, कभी हँसाती,
कभी रुलाती और कभी गुदगुदाती।
 

जीवन का हर पहलू मेरे अस्तित्व में समाता है,
समाज का आइना हूँ मैं सबक सबको सिखाती हूँ,
सुनकर मुझे कोई दिल में बसाता है,
कोई पन्ने पर स्याही है बिखरी पड़ी।
 

सोच आगे बढ़ जाता है कोई,
नासमझ फाड़कर मुझे कचरा बनाता है,
जी हाँ मैं कविता हूँ, मंच से पढ़ी जाती हूँ,
परिचय मेरा संक्षिप्त किंतु
किताबों का पन्ना रचनाओं से भरा है।
 

ना जाने कितने रचनाकार मेरी कोख़ से जन्मे हैं,
विचारों का अथाह सागर,
उनके मस्तिष्क में बनाती हूँ,
और किताबों के पन्नों में
सज संवर कर प्रस्तुत हो जाती हूँ।
 

विचारों भावनाओं और हादसों की
कमी नहीं इस संसार में,
इसलिए मैं कविता बनकर हर बार
एक नये रूप में आती हूँ,
अच्छे सन्देश सिखाती हूँ।

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