जीवन दर्शन  RAHUL Chaudhary

जीवन दर्शन

RAHUL Chaudhary

सादगी के पल दो चार हैं जीने को,
बाकी जीवन बस कहने सुनने को।
 

तिनका तिनका ओढ़ लिया
माटी के सिरहाने पर,
लिपटे मोह से प्यासे बैठे रहे
वर्षा के मुहाने पर।
 

घट-घट ढूँढा
बैरी मन को,
पर बूंद-बूंद से प्यास बुझी
सागर के नौका पर।
 

सादगी के पल दो चार हैं जीने को,
बाकी जीवन बस कहने सुनने को।
 

एक पल अपना हो आराम का
पाने को उस ज़रिए को,
भाग-भाग के हम थक गए
इस लत सी दिनचर्या को।
 

कर खाली तेरा मेरा सबका,
स्थिर ना कुछ जग में रहता,
सच है ठहराव हर ज़र्रे का
नश्वर है, बे प्राण है, ना टिकता।
 

ना बिंदु न कोई स्थिरता,
संसार एक पहिया है काल का,
शुरूआत में है अंत और
अंत ही में शुरुआत का।
 

दुहराएगा हर चाल इस काल का,
जीवन और मृत्यु के जंजाल का,
अंतरात्मा में रोशनी के ताल का,
तोड़ है गमनागमन के जाल का।

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