खून पसीने की नींव  RAHUL Chaudhary

खून पसीने की नींव

RAHUL Chaudhary

प्रात रश्मियों से आभा मंडित,
नभ थल जल किरणों से आच्छादित,
धरती ने छेड़ा राग सुबह का,
कलरव की मधुर ध्वनि से,
पूरबा ने थपकी देकर
आँखों पर यू हाथ फेरकर।
 

निस दिन सा नित्य पग से
फटी हथेली की लकीरें नहलाकर,
लेकर अपने बरछी भाले,
जीविका को जिलाने,
भार माथे भर धरकर,
दो टूक के बहाने।
 

ईंट पत्थर मिट्टी ढोकर,
घर रोशनी से भरकर,
श्रम की बूंदों में नहाकर,
तपती धूप में जलकर भुनकर,
खुद प्यास से तड़पकर,
परिवार को छाँव के खातिर।
 

मैली कुचली लिपटी सी
फटे वस्त्रों में एक मूरत,
इस मूरत को क्या कहें,
ममता की या वत्सल की,
अरुण आभा चेहरे पर निर्मल सी,
या खुशियों की चादर परिवार की।
 

खुद सह लेती है सितम ,
रग-रग से छानकर दूध की धार बहाकर,
मातृत्व की जागती जीती मूरत,
खून का कतरा न्यौछावर कर,
बच्चों के लिए कभी,
जीवन पर्यन्त परिवार के ऊपर।
 

गुज़र गई रियासतें,
रह गई नारी श्रम करती,
कभी परिवार तो कभी बच्चों की,
बिखरी नहीं जिम्मेदारियों से,
इमारतें खड़ी जगमगाती रही,
त्याग की नींव पर रक्त की,
नमी में सनी महल, माटी हर मजदूर के।

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