भारत भूमि  Anupama Ravindra Singh Thakur

भारत भूमि

Anupama Ravindra Singh Thakur

भारत की इस विलक्षण भूमि को
करो शत शत प्रणाम,
हर एक को इसने अपनाकर
दे दिया शत्रुता को विराम।
 

आक्रमणकारी तुर्क हों
या हों लुटेरे अंग्रेज,
सबका स्वागत किया इसने
बिछाई फूलों की सेज।
 

लुटेरे बन बैठे शासक
शुरू हुआ उनका राज,
देशभक्त पर गोलियाँ चलाई
पहना हिंदुस्तान का ताज।
 

200 वर्षों तक खून बहाया
मिटा दिए सारे तख्तो ताज,
फिर भी हम मेहमान समझकर
निभाते रहे अतिथि देवो भव का रिवाज।
 

भारत की इस विलक्षण भूमि को
करो शत शत प्रणाम,
हर एक को इसने अपना कर
दे दिया शत्रुता को विराम।
 

खूब लूटा भारत को
बिल्कुल कंगाल बनाया,
देख हर तरफ भुखमरी
फिरंगी बहुत हर्षाया।
 

कुछ ना बचा यहाँ अब
यह सोच जाने का मन बनाया,
जाते जाते विभाजन का
अंतिम आघात पहुँचाया।
 

माउंटबेटन के इस निर्णय को भी
हमने हँसते-हँसते गले लगाया,
भारत की इस विलक्षण भूमि को
करो शत-शत प्रणाम,
हर एक को इसने अपनाकर
दे दिया शत्रुता को विराम।
 

70 वर्षों में फिर से हमने
एक नया हिंदुस्तान बनाया,
सभी धर्म जाति को लेकर
एक नया उपवन सजाया।
 

भुखमरी, कंगाली का यहाँ से
नामो निशान मिटाया,
हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन
फिर सोने की चिड़िया कहलाया।
 

भारत की इस विलक्षण भूमि को
करो शत-शत प्रणाम,
हर एक को इसने अपनाकर
दे दिया शत्रुता को विराम।
 

निशस्त्रीकरण की शर्त रख कर
विश्व बंधुत्व का पाठ पढ़ाया,
प्रेम, अहिंसा, शांति का संदेश देकर
विश्व गुरु कहलाया।
 

विश्व की डगर पर मेरा
तिरंगा हर तरफ लहराया,
भारत की इस विलक्षण भूमि को
करो शत-शत प्रणाम,
हर एक को इसने अपनाकर
दे दिया शत्रुता को विराम।

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