धूप  Arpit Gupta

धूप

Arpit Gupta

पीली-पीली सोन्धी-सोन्धी सर्दियों की धूप तुम,
घुलती जाती हो बदन में थोड़ी-थोड़ी ख़ूब तुम।
 

धीमी होती हो तो आता है बड़ा आनंद सा,
तेज़ होती हो दिखा देती हो असली रूप तुम।
 

बादलों को चीरकर फैलाती अपनी रोशनी,
चाहती हो तुम बिखरना हो बड़ी मजबूर तुम।
 

तेज़ सूरज हो उठा है देख तेरी स्थिति,
सूर्य सा तेजस्वी हूँ मैं मेरी पीली धूप तुम।

अपने विचार साझा करें




1
ने पसंद किया
128
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com