मंज़िल  APOORVA SINGH

मंज़िल

APOORVA SINGH

तू सपने देखना छोड़ ना देना,
राह तू अपनी मोड़ ना लेना,
रख हौसला खुद से तू,
विश्वास अपना तोड़ ना देना।
 

उस पथ पे तू चलता चल
हों काँटे कितने भी,
उस नभ की ओर बढ़ता चल
हो साँसें कितनी भी।
 

चलेगा तू चिकनी मिट्टी पे
तो मंज़िल कभी ना पाएगा,
पाँव पड़ेगा गिट्टी पे
तो ही मन का खाएगा।
 

पड़ेंगे छाले पैरों में
परिहास बनेगा गैरों में,
अपने कभी साथ ना देंगे
मदद का भी हाथ ना देंगे।
 

फिर भी तू निराश ना होना
जीते जी हताश ना होना,
हो संघर्ष कितना भी
किसी भी पल उदास ना होना।
 

ये तो है एक परीक्षा
जो रब ने तेरे बनाई है,
मिलेगी तुझे ऐसी शिक्षा
जो आजतक कभी ना पाई है।
 

तेरा दिन भी आएगा
धैर्य रखना छोड़ ना देना,
मंज़िल तू भी पाएगा
चलते पाँव रोक ना देना।
 

जीवन में कुछ बनना है
तो अर्जुन जैसा करना है,
हो कितनी भी रुकावटें
ध्यान ना भंग करना है।
 

हो मंज़िल कितनी भी दूर
वापस नहीं लौटना है,
हो कितनी भी बारिश
पाँव नहीं फिसलना है।
 

तू सपने देखने छोड़ ना देना
राह तू अपनी मोड़ ना लेना,
रख हौसला खुद से तू
विश्वास खुद से तोड़ ना देना।

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