मर्यादा पुरुषोत्तम राम  Anupama Ravindra Singh Thakur

मर्यादा पुरुषोत्तम राम

Anupama Ravindra Singh Thakur

हे ! मर्यादा पुरुषोत्तम राम
आप ह्रदय में मेरे बसते हैं,
पर पढ़ रामायण कथा
कई प्रश्न मन में खटकते हैं।
आप तो अंतर्यामी थे,
जानकी को अच्छी तरह जानते थे,
उसके सतीत्व को पहचानते थे,
फिर क्यों उसे
अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा ?
अपनी पवित्रता को
क्यों उसे प्रमाणित करना पड़ा?
अपनी चरण धूलि से तो
आपने अहिल्या का उद्धार किया,
फिर क्यों अपनी ही भार्या को
अग्नि के हाथों सौंप दिया?
उसी क्षण, अपने विश्वास को
क्यों नहीं, सब के समक्ष व्यक्त किया?
 

हे मर्यादा पुरुषोत्तम राम
आप ह्रदय में मेरे बसते हैं
पर पढ़ रामायण कथा
कई प्रश्न मेरे मन में खटकते हैं।
आप दीन दयालु, कृपा निधान, दुखहर्ता हैं,
सीता के ईश्वरीय गुणों को
अच्छी तरह पहचानते हैं,
जानकी की पवित्रता प्रश्न पर
आप क्यों विचलित हुए ?
लोक निंदा के भय से
क्यों जानकी को
वन छोड़ने विवश हुए?
हे लीलाधर! सीता का परित्याग
यह आपकी कौन सी माया है?
जिसे जगत समझ नहीं पाया है।
लव-कुश को वाल्मीकि से
शिक्षा दिलाने का
क्या मात्र यही उपाय
आपके मस्तिष्क में आया है?
बताते क्यों नहीं?
इस अज्ञानी जगत को
आपने सीता का त्याग नहीं किया है।
बल्कि सती साध्वी, जगत-जननी को
लव-कुश की शिक्षा-दीक्षा के लिए
भरपूर अवसर प्रदान किया हैं।
आपके गोपनीय प्रेम को
संसार समझ नहीं पाया है,
वैदेही के निर्वासन का
लांछन आप पर लागया है।
आपके हृदय में बसी सीता को
हम देख नहीं पाते हैं,
इसलिए हे मर्यादा पुरुषोत्तम राम
कई प्रश्न हमारे मन में खटकते हैं।
 

आज भी कलयुगी सीता
हर दिन अग्नि परीक्षा से गुजरती है,
आपके मौन भंग प्रतीक्षा में
आपका स्मरण वह करती है।
निश्कलंक सीता को
रावण से तो छुड़ा लिया था,
पर इस पतित समाज से
आप उसे बचा नहीं पाए थे,
क्योंकि जिस समाज में
स्त्री भावना नहीं, भोग्या है,
जहाँ स्त्री आस्था का नहीं
मात्र अधिकार का विषय है,
वहाँ हे! मर्यादा पुरुषोत्तम राम
आप भी नहीं कुछ कर पाए हैं।
ऐसे दुर्बुद्धि, दुर्मुख समाज से
दूर भेज कर
अपनी पत्नी की
पवित्रता की,
मान की रक्षा करना
अद्वितीय पराक्रम का
प्रमाण है
हे ! राम आपको मेरा शत-शत प्रणाम है।

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