नासमझी  SANTOSH GUPTA

नासमझी

SANTOSH GUPTA

सवाल पर सवाल वह पूछती रही,
जवाब पर जवाब मैं देता रहा,
समझ कर भी वह नासमझ बनती रही,
मैं समझाने का धीरज खोता रहा,
अब तक वह मुझे नहीं समझती थी,
अब मैं नासमझ होता गया।
 

हम समझाने की कोशिश करते रहे,
वह 'समझ' की बात करती रही,
मैं उनको समझकर भी न समझा,मैं
वह मुझे न समझकर भी 'समझी' है,
मैं उन्हें समझ की बात समझाता रहा,
वह 'समझ' कर ही बनी नासमझी है।
 

मैं इस बात को ना समझा कि नासमझी में ही 'समझ' है,
वह इस बात को समझ गई कि समझने में नासमझी है।

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