वर्षा  Anupama Ravindra Singh Thakur

वर्षा

Anupama Ravindra Singh Thakur

मेघ उमड़-घुमड़ चहुँ ओर से आए
काले -काले हो मतवाले से मंडराये,
गड़गड़ाहट की आवाज से आकाश को गुंजाए।
पर यह क्या बिना बरसे ही चले जाए
इनका तो यह नित्य का क्रम हो गया,
क्यों मौसम हमसे खिन्न हो गया?
जब हमने उनसे यह सवाल किया
उन्होंने भी हँसकर जवाब दिया,
और पेड़ों को कटवाओ
जनसंख्या भी खूब बढ़ाओ,
नए-नए बाँध बनाओ
प्रकृति को हर रोज दुखाओ।
फिर कैसे पर्यावरण में संतुलन होगा
कैसे सब कुछ सामान्य होगा?
अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार
स्वयं तू क्यों रोता है ?
बिना पेड़ों के वर्षा हो
यह कैसे संभव हो सकता है?
अभी भी वक्त है जाग जाओ,
वृक्षारोपण को बढ़ाओ,
वृक्षारोपण को बढ़ाओ।

अपने विचार साझा करें




0
ने पसंद किया
735
बार देखा गया

पसंद करें


  परिचय

"मातृभाषा", हिंदी भाषा एवं हिंदी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लघु प्रयास है। "फॉर टुमारो ग्रुप ऑफ़ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग" द्वारा पोषित "मातृभाषा" वेबसाइट एक अव्यवसायिक वेबसाइट है। "मातृभाषा" प्रतिभासम्पन्न बाल साहित्यकारों के लिए एक खुला मंच है जहां वो अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सुलभता से मुखर कर सकते हैं।

  Contact Us
  Registered Office

47/202 Ballupur Chowk, GMS Road
Dehradun Uttarakhand, India - 248001.

Tel : + (91) - 7534072808
Mail : info@maatribhasha.com