कोरोना  Ravi Panwar

कोरोना

Ravi Panwar

कब, कहाँ, कैसे आया,
किस कुटिल के गर्भ से,
आँसुओं के दर्द से,
मन के जलते ताप से,
या दुखते दिल के शाप से,
पर जैसे भी, मैं आया हूँ,
आपदा, त्रासदी,
और वह जहर बनकर,
टूटा हुआ कहर बनकर,
चीन का चमचमाता खिलौना हूँ,
कोरोना हूँ।
 

निकला हूँ विश्व भ्रमण पर,
चल रहा हूँ, निरंतर,
पल रहा हूँ,
आँखों के कुटुंब में,
हाथों की रेखाओं में,
लोगों के जहन में,
मन के वहम में,
दिन-प्रतिदिन,
आ पहुँचा हूँ ,
इस बार, इस सरजमीं पर।
 

पर, यह क्या
यहाँ ठहरी हुई नदी,
रुकी हुई पवन,
सोया हुआ समंदर,
और सुनसान चौराहों पर,
सन्नाटा क्यों चीख रहा है,
दहाड़ क्यों नहीं रही वीरान गालियाँ,
खैर कुछ मिले,
जिन्होंने पूछ कर मुझसे खैरियत मेरी,
अपनी खैरियत बिगाड़ ली।
 

और फिर आए कुछ नकाबों में कैद,
लिए हाथ में डंडे,
मेहमान नवाज़ी को मेरी,
सब बंद हैं दरवाज़े,
किधर जाऊँ,
ज़िंदा रहूँ या,
मर जाऊँ।
नाराज़ हूँ इनके आतिथ्य से
पर हूँ तो बीमारी,
मृत्यु से भारी,
और जीवन का कोई विकल्प भी नहीं होता।
 

चला जाऊँगा एक दिन शायद,
किन्तु मैं अंत नहीं हूँ,
ख़ौफ़ हूँ, ज़िंदा रहूँगा,
और लौटूँगा तब-तब
जब पृथ्वी कराहेगी दर्द से,
खाँसेगी धुँए की घुटन से,
और तपेगा उसका शरीर बुखार से,
मैं फिर आऊँगा,
बिन बताए,
किसी और नाम के साथ।

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