महाभारत - एक महाकाव्य  SANTOSH GUPTA

महाभारत - एक महाकाव्य

SANTOSH GUPTA

एक अंधे ने देखा था सपना
ईर्ष्या में बस सीखा था तपना,
अनुज पुत्र जब ज्येष्ठ हुआ
शुरु हुआ फिर उसका तड़पना।
 

भार्या तो सरल ही नारी थी
उसके हठ से हारी थी,
स्वस्थ नेत्र पा कर भी
दृष्टिहीन हुई गांधारी थी।
 

प्रतिशोध की कुछ ज्वाला थी
सीने पर पड़ी कुछ छाला थी,
हस्तिना से प्रतिकार की
शकुनि ने गूँथी एक माला थी।
 

भाँजों को भड़काया था
ओछापन सिखलाया था,
थे जो कुरू के वंशज
उन्हें विध्वंसक बनाया था।
 

पांडु के थे पाँच वीर
धृतराष्ट्र के सौ अधीर,
युवराज के घोष में
योग्य था ज्येष्ठ युधिष्ठिर।
 

द्रोण समक्ष सब सम थे
सिखाए सभी को धर्म थे,
पांडव श्रेष्ठ शिष्य हुए, पर
कौरव भी कहाँ कम थे।
 

भीम महाबली गदाधारी था
अर्जुन सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी था,
नकुल, सहदेव सुंदर, ज्ञानी
युधिष्ठिर धर्म का पुजारी था।
 

थे प्रतिभावान और कौशल
पर अधर्मी के जैसे थे मन,
सुसाशन बना दुशासन
और सुयोधन, दुर्योधन।
 

हस्तिनापुर के तूणीर में
एक और तेज तीर था,
सूर्यपुत्र था जन्म से
कहलाता दानवीर था।
 

अंगराज बनाया था उसको
अर्जुन को ललकार कर,
दुर्योधन ने दी थी चुनौती
पार्थ से तकरार कर।
 

राज्य की लालच थी इतनी
लाक्षागृह का षड्यंत्र रचा,
मामा संग मिल भाँजों ने
हत्या का संयंत्र रचा।
 

हुए सुरक्षित कुंती पुत्र
विदुर की धर्मनीति से,
व्यापन किया जीवन का
ब्राह्मण जन की रीति से।
 

भेदकर बाण से मीन लोचन
बनाया पांचाली को दुल्हन,
हुआ अपमान क्षत्रियों का
द्रोपदी को ले गए ब्राह्मण।
 

हुआ शुरु फिर विवाद था
भीष्म का आर्तनाद था,
पांडवों को देकर खांडव
अंत किया प्रतिनाद था।
 

वन फिर नगर बना
धर्म की डगर बना,
पांडवों की राजधानी
इंद्रप्रस्थ सुंदर बना।
 

मयासुर ने अद्भुत महल बनाया
प्रतिवाद का पहल बनाया,
दुर्योधन को भ्रम हुआ
जल के समान स्थल बनाया।
 

गिर पड़ा वह नाद में
फिर एक प्रतिवाद में,
पांडव वधू ने अंधा कहकर
उपहास किया उन्माद में।
 

हुआ क्रोधित धृतराष्ट्र पुत्र
अग्नि दहकी तन मन में,
ठाना फिर प्रतिद्वंद का
कांड कठोर दुर्योधन ने।
 

किया आंमत्रित राजा को
शकुनि की एक चाल में,
चौसर के खेल में फँसाया
बिछाकर एक जाल में।
 

कपटी ने धोके से
सारे दाँव जीत लिए,
हारकर वामा को भी पांडव
गृहणी को अपमानित किए।
 

दुर्योधन ने क्रोध निकाला
दुशासन को कह डाला,
वस्त्रहरण कर कुलवधू का
कुरूवंश का किया मुँह काला।
 

प्रकट होकर केशव ने
स्त्रीत्व का सम्मान किया,
दुशासन की बर्बरता का
अप्रतिम व्यवधान किया।
 

सभा में एक नीरवता थी
हृदयों में एक व्यथा थी,
मौन धरे आचार्य, पितामह,
कुरुओं की कैसी प्रथा थी।
 

द्रोपदी ने श्राप देने को
मुख अपना खोला था,
तीक्ष्ण शब्दों के तेज से
राजमाता ने फिर बोला था।
 

लौटाया था धृतराष्ट्र ने तब
धर्मराज जो हारा था,
कैसे पाता प्रतिष्ठा वापस
अपमान का वह मारा था।
 

दुर्योधन ने फिर विष उगला
दाँव जीत का राग किया,
वनवास और अज्ञातवास का
दुष्ट ने फिर माँग किया।
 

शकुनि के चाल की
गति निर्धारित होती गई,
पांडवों के संग वन में
पांचाली पीड़ित होती गई।
 

हुआ सफल वनवासी जीवन
और अज्ञातवास हो गए पूरे,
करने थे वह धर्म कर्म सब
रह गये थे जो अधूरे।
 

नहीं पड़ी थी ठंडक मन में
शकुनि ने फिर ध्यान किया,
पांडवों से डाह में आकर
युद्ध का आह्वान किया।
 

मना किया था पांडवों ने
परहेज था संग्राम से,
पंच गाँव को लेकर
उन्हें जीना था आराम से।
 

सुई की नोक भी नहीं दूँगा
कहलवाया था दूत से,
दुर्योधन तो सीखा था सब
गांधार के उस धूर्त से।
 

महा युद्ध तब निश्चित हुआ
शंखनाद तब गुंजित हुआ,
ग्यारह सात के अनुपात में
सेना दल चयनित हुआ।
 

कृष्ण हुए तब सारथी
पार्थ के रथ वाहक बनकर,
पांडवों की सेना में
अधर्म का संहारक बनकर।
 

कौरवों की सेना के
पितामह नायक बने,
दुर्योधन के अहंकार में
असफल सहायक बने।
 

धनंजय तब चिंतित हुआ
धर्मयुद्ध से विचलित हुआ,
माधव ने गीता ज्ञान दिया
क्षत्रिय धर्म का ध्यान दिया।
 

शिखंडी की छल से
पृथापुत्र ने भेदा भीष्म को,
बाणों की शैय्या पर लिटाकर
बुझाया फिर उनके तृष्ण को।
 

द्रोणाचार्य फिर बने थे नायक
सैन्यभार को संभालकर,
दुर्योधन के विश्वास बने
चक्रव्यूह को डालकर।
 

चक्रव्यूह में फँसकर
अभिमन्यु मारा गया,
वासुदेव की लीला से
जयद्रथ संहारा गया।
 

अश्वत्थामा के मृत्यु के
जनप्रवाद से विक्षिप्त हुए,
धृष्टद्युम्न के प्रहार से
द्रोणाचार्य पराजित हुए।
 

कर्ण बना फिर सेनापति
बस अर्जुन से था रण उसका,
चार कुंती पुत्रों के
जीवनदान का था प्रण उसका।
 

फँसा रथ उसका दलदल में
अर्जुन ने बाण चलाया,
कवच कुंडल देकर इंद्र को
कर्ण ने प्राण गँवाया।
 

सीना चीरकर दुशासन का
भीम ने रक्तपान किया,
द्रौपदी ने बालों को धोकर
वापस अपना सम्मान लिया।
 

हुई सेना धराशायी कौरवों की
सहदेव ने शकुनि को मारा,
हार देख सम्मुख दुर्योधन
लिया उसने सरोवर का सहारा।
 

धर्मराज ने उसको ललकारा
निकलकर उसने हुँकारा,
भीम से भिड़ने को
गदाधुद्ध करने को।
 

उतरा था अखाड़े में
वज्र सा धड़ लेकर वो,
तोड़ा भीम ने जाँघों को
किया पूरा प्रण, लेकर वो।
 

अठारह दिनों के महायुद्ध के
विचित्र कथा का समापन हुआ,
महाभारत के इतिहास के
एक अध्याय का उद्घाटन हुआ।

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